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Q: ‘‘मन्द-मन्द मुरली बजावत अधर धरे, मन्द-मन्द निकस्यो मुकुन्द मधु-बन तें’’ उपर्युक्त काव्य पंक्तियोंमें काव्य-गुण है
  • A. माधुर्य
  • B. ओज
  • C. प्रसाद
  • D. उपर्युक्त में से एक से अधिक
  • E. उपर्युक्त में से कोई नहीं
Correct Answer: Option A - उपर्युक्त काव्य पंक्तियों में माधुर्य काव्य गुण है। ⇒ माधुर्य गुण-काव्य से हृदय में मधुरता का संचार होना माधुर्य गुण कहलाता है। उदाहरण-‘बसौ मोरे नैनन मा नंदलाल’ इसमें लम्बे समासों; लम्बे अनुप्रास वाले पदों का प्रयोग नहीं होता है। शृंगार, करूण और शांत इससे सम्बद्ध रस है। ‘ट वर्ग’ व्यंजन, संयुक्ताक्षरों और दीर्घ समासयुक्त पदों का प्रयोग नहीं होता। अनुनासिक और अनुस्वार वाले वर्णों की अधिकता। ⇒ ओज गुण-काव्य से हृदय में उत्साह, उमंग, आवेश और स्फूर्ति आद का संचार होना ‘ओज’ गुण कहलाता है। उदाहरण- ‘‘हिमाद्रि तुंगशृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती। स्वयंप्रभा, समुज्जवला स्वतंत्रता पुकारती।।’’ ⇒ द्वित्व वर्णों (ग्ग, क्क, च्च, म्म आदि) संयुक्ताक्षरों, दीर्घ समासयुक्त पदों और ‘र’ के संयोगयुक्त ‘ट वर्ग’ की प्रधानता। वीर, रौद्र, भयानक और वीभत्स रस इससे सम्बद्ध रस है। ⇒ प्रसाद गुण-काव्य से हृदय में शांति का संचार होना और चित्तगत प्रसन्नता ‘प्रसाद गुण’ कहलाता है। उदाहरण-‘नर हो न निराश करो मन को’ इसमें चल (माधुर्य गुण) और अग्नि (ओज गुण) का समावेश माना जाता है। अत: भावानुकूल सभी वर्गों का प्रयोग स्वीकृत है। सरल सीधे शब्दों में रचना तथा अर्थ की स्पष्टता इसके प्रधान गुण है।
A. उपर्युक्त काव्य पंक्तियों में माधुर्य काव्य गुण है। ⇒ माधुर्य गुण-काव्य से हृदय में मधुरता का संचार होना माधुर्य गुण कहलाता है। उदाहरण-‘बसौ मोरे नैनन मा नंदलाल’ इसमें लम्बे समासों; लम्बे अनुप्रास वाले पदों का प्रयोग नहीं होता है। शृंगार, करूण और शांत इससे सम्बद्ध रस है। ‘ट वर्ग’ व्यंजन, संयुक्ताक्षरों और दीर्घ समासयुक्त पदों का प्रयोग नहीं होता। अनुनासिक और अनुस्वार वाले वर्णों की अधिकता। ⇒ ओज गुण-काव्य से हृदय में उत्साह, उमंग, आवेश और स्फूर्ति आद का संचार होना ‘ओज’ गुण कहलाता है। उदाहरण- ‘‘हिमाद्रि तुंगशृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती। स्वयंप्रभा, समुज्जवला स्वतंत्रता पुकारती।।’’ ⇒ द्वित्व वर्णों (ग्ग, क्क, च्च, म्म आदि) संयुक्ताक्षरों, दीर्घ समासयुक्त पदों और ‘र’ के संयोगयुक्त ‘ट वर्ग’ की प्रधानता। वीर, रौद्र, भयानक और वीभत्स रस इससे सम्बद्ध रस है। ⇒ प्रसाद गुण-काव्य से हृदय में शांति का संचार होना और चित्तगत प्रसन्नता ‘प्रसाद गुण’ कहलाता है। उदाहरण-‘नर हो न निराश करो मन को’ इसमें चल (माधुर्य गुण) और अग्नि (ओज गुण) का समावेश माना जाता है। अत: भावानुकूल सभी वर्गों का प्रयोग स्वीकृत है। सरल सीधे शब्दों में रचना तथा अर्थ की स्पष्टता इसके प्रधान गुण है।

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उपर्युक्त काव्य पंक्तियों में माधुर्य काव्य गुण है। ⇒ माधुर्य गुण-काव्य से हृदय में मधुरता का संचार होना माधुर्य गुण कहलाता है। उदाहरण-‘बसौ मोरे नैनन मा नंदलाल’ इसमें लम्बे समासों; लम्बे अनुप्रास वाले पदों का प्रयोग नहीं होता है। शृंगार, करूण और शांत इससे सम्बद्ध रस है। ‘ट वर्ग’ व्यंजन, संयुक्ताक्षरों और दीर्घ समासयुक्त पदों का प्रयोग नहीं होता। अनुनासिक और अनुस्वार वाले वर्णों की अधिकता। ⇒ ओज गुण-काव्य से हृदय में उत्साह, उमंग, आवेश और स्फूर्ति आद का संचार होना ‘ओज’ गुण कहलाता है। उदाहरण- ‘‘हिमाद्रि तुंगशृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती। स्वयंप्रभा, समुज्जवला स्वतंत्रता पुकारती।।’’ ⇒ द्वित्व वर्णों (ग्ग, क्क, च्च, म्म आदि) संयुक्ताक्षरों, दीर्घ समासयुक्त पदों और ‘र’ के संयोगयुक्त ‘ट वर्ग’ की प्रधानता। वीर, रौद्र, भयानक और वीभत्स रस इससे सम्बद्ध रस है। ⇒ प्रसाद गुण-काव्य से हृदय में शांति का संचार होना और चित्तगत प्रसन्नता ‘प्रसाद गुण’ कहलाता है। उदाहरण-‘नर हो न निराश करो मन को’ इसमें चल (माधुर्य गुण) और अग्नि (ओज गुण) का समावेश माना जाता है। अत: भावानुकूल सभी वर्गों का प्रयोग स्वीकृत है। सरल सीधे शब्दों में रचना तथा अर्थ की स्पष्टता इसके प्रधान गुण है।