Correct Answer:
Option A - कुंडालिनी के उद्बुद्ध होने पर जो स्फोट होता है उसे नाद कहते हैं ‘नाद’ और ‘बिन्दु’ संज्ञाएँ ब्रजयान सिद्धों में बराबर चलती रही, गोरख सिद्धांत में इसका उल्लेख मिलता है। ‘नाद’ और ‘बिन्दु’ के योग से जगत की उत्पत्ति सिद्ध और हठयोगी दोनों मानते हैं। नाथ सम्प्रदाय में हठयोग मूलत: देहशुद्ध का साधन है। देहशुद्धि और प्राणायाम से मन एकाग्र कर लेने के पश्चात् कुंडालिनी को जागृति करता है। महा कुंडालिनी में ही व्याप्त शक्ति का समाहार होता है। घट के भीतर चक्रो की कल्पना की गई है जिनसे होती हुई कुंडालिनी ब्रह्मरंध्र तक पहुँचकर सिद्धि की अनाहत घोष करती है।
A. कुंडालिनी के उद्बुद्ध होने पर जो स्फोट होता है उसे नाद कहते हैं ‘नाद’ और ‘बिन्दु’ संज्ञाएँ ब्रजयान सिद्धों में बराबर चलती रही, गोरख सिद्धांत में इसका उल्लेख मिलता है। ‘नाद’ और ‘बिन्दु’ के योग से जगत की उत्पत्ति सिद्ध और हठयोगी दोनों मानते हैं। नाथ सम्प्रदाय में हठयोग मूलत: देहशुद्ध का साधन है। देहशुद्धि और प्राणायाम से मन एकाग्र कर लेने के पश्चात् कुंडालिनी को जागृति करता है। महा कुंडालिनी में ही व्याप्त शक्ति का समाहार होता है। घट के भीतर चक्रो की कल्पना की गई है जिनसे होती हुई कुंडालिनी ब्रह्मरंध्र तक पहुँचकर सिद्धि की अनाहत घोष करती है।