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Q: डिम्भादे: स्वक्रियारूपादिवर्णने अलङ्कारो भवति –
  • A. स्वभावोक्ति:
  • B. परिसंख्या
  • C. उत्प्रेक्षा
  • D. अतिशयोक्ति:
Correct Answer: Option A - डिम्भादे: स्वक्रियारूपादिवर्णने स्वभावोक्ति: अलंकारो भवति। अर्थात् बालक आदि की अपनी (स्वाभाविक) क्रिया अथवा रूप (अर्थात् वर्ण, एवं अवयव संस्थान) के वर्णन में ‘स्वभावोक्ति’ अलंकार होता है। यहाँ रूपादि से रंग संस्थान अर्थात् अवयवों की बनावट का ग्रहण होता है। उदाहरण- पश्चादंघ्री प्रसार्य त्रिकनति.................................मन्दं शब्दायमानो विलिखति शयनादुत्थित: क्षमां खुरेण।। (काव्यप्रकाश में) इसमें घोड़े के स्वभाव का वर्णन होने से स्वभावोक्ति अलंकार है अत: विकल्प (a) सही शेष अन्य विकल्पों के लक्षण अग्रलिखित हैं- (1) परिसंख्या- किंचित्पृष्टमपृष्टं वा कथितं यत्प्रकल्पते। तादृगन्यव्यपोहाय परिसंख्या तु सा स्मृता।। (2) उत्प्रेक्षा - सम्भावनमथोत्प्रेक्षा प्रकृतस्य समेन यत्। (3) अतिशयोक्ति - निगीर्याध्यवसानन्तु प्रकृतस्य परेण यत् प्रस्तुतस्य यदन्यत्वं यद्यर्थोक्तौ च कल्पनम्।। कार्यकारणयोर्यश्च पौर्वापर्यविपर्यय:। विज्ञेयाऽतिशयोक्ति: सा।
A. डिम्भादे: स्वक्रियारूपादिवर्णने स्वभावोक्ति: अलंकारो भवति। अर्थात् बालक आदि की अपनी (स्वाभाविक) क्रिया अथवा रूप (अर्थात् वर्ण, एवं अवयव संस्थान) के वर्णन में ‘स्वभावोक्ति’ अलंकार होता है। यहाँ रूपादि से रंग संस्थान अर्थात् अवयवों की बनावट का ग्रहण होता है। उदाहरण- पश्चादंघ्री प्रसार्य त्रिकनति.................................मन्दं शब्दायमानो विलिखति शयनादुत्थित: क्षमां खुरेण।। (काव्यप्रकाश में) इसमें घोड़े के स्वभाव का वर्णन होने से स्वभावोक्ति अलंकार है अत: विकल्प (a) सही शेष अन्य विकल्पों के लक्षण अग्रलिखित हैं- (1) परिसंख्या- किंचित्पृष्टमपृष्टं वा कथितं यत्प्रकल्पते। तादृगन्यव्यपोहाय परिसंख्या तु सा स्मृता।। (2) उत्प्रेक्षा - सम्भावनमथोत्प्रेक्षा प्रकृतस्य समेन यत्। (3) अतिशयोक्ति - निगीर्याध्यवसानन्तु प्रकृतस्य परेण यत् प्रस्तुतस्य यदन्यत्वं यद्यर्थोक्तौ च कल्पनम्।। कार्यकारणयोर्यश्च पौर्वापर्यविपर्यय:। विज्ञेयाऽतिशयोक्ति: सा।

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डिम्भादे: स्वक्रियारूपादिवर्णने स्वभावोक्ति: अलंकारो भवति। अर्थात् बालक आदि की अपनी (स्वाभाविक) क्रिया अथवा रूप (अर्थात् वर्ण, एवं अवयव संस्थान) के वर्णन में ‘स्वभावोक्ति’ अलंकार होता है। यहाँ रूपादि से रंग संस्थान अर्थात् अवयवों की बनावट का ग्रहण होता है। उदाहरण- पश्चादंघ्री प्रसार्य त्रिकनति.................................मन्दं शब्दायमानो विलिखति शयनादुत्थित: क्षमां खुरेण।। (काव्यप्रकाश में) इसमें घोड़े के स्वभाव का वर्णन होने से स्वभावोक्ति अलंकार है अत: विकल्प (a) सही शेष अन्य विकल्पों के लक्षण अग्रलिखित हैं- (1) परिसंख्या- किंचित्पृष्टमपृष्टं वा कथितं यत्प्रकल्पते। तादृगन्यव्यपोहाय परिसंख्या तु सा स्मृता।। (2) उत्प्रेक्षा - सम्भावनमथोत्प्रेक्षा प्रकृतस्य समेन यत्। (3) अतिशयोक्ति - निगीर्याध्यवसानन्तु प्रकृतस्य परेण यत् प्रस्तुतस्य यदन्यत्वं यद्यर्थोक्तौ च कल्पनम्।। कार्यकारणयोर्यश्च पौर्वापर्यविपर्यय:। विज्ञेयाऽतिशयोक्ति: सा।