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Q: 'Yardangs' is a topographic feature of – ‘यारडंग’ एक स्थलाकृति है–
  • A. Aeolian landscape/वायूढ़ भू–दृश्य
  • B. Glacier landscape/हिमानी भू–दृश्य
  • C. Karst landscape/कार्ट्स भू–दृश्य
  • D. Fluvial landscape/नदीय भू–दृश्य
Correct Answer: Option A - यारडंग पवन के अपरदन द्वारा निर्मित स्थलाकृति है जिसकी रचना ज्यूजेन के विपरीत होती है। जब कोमल तथा कठोर चट्टानों के स्तर लम्बवत दिशा में मिलते हैं, तो पवन कठोर शैल की अपेक्षा मुलायम शैल को शीघ्र अपरदित करके उड़ा ले जाती है। इस प्रकार कठोर शैलों के मध्य कोमल शैलों के अपरदित होकर उड़ जाने के कारण चट्टानों के भाग खड़े रह जाते हैं। इन शैलों के पार्श्व में पवन द्वारा कटाव होने से नालियाँ बन जाती है। इस तरह के स्थलरूप को यारडंग कहते हैं। यारडंग का निर्माण निश्चित रूप से पवन के अपघर्षण कार्य द्वारा होता है। पवन द्वारा अपरदनात्मक स्थलरूप– अपवाह बेसिन या वात गर्त, इन्सेलबर्ग, छत्रकशिला, भू स्तम्भ, ज्यूजेन, यारडंग, ड्राइकांटर, जालक या जालीदार शिला, पुल तथा खिड़की आदि। पवन द्वारा निक्षेपणात्मक स्थलरूप–बालुका स्तूप, सीफ, बरखान, लोयस, बालसन, प्लेया, बजादा तथा पेडीमेन्ट आदि।
A. यारडंग पवन के अपरदन द्वारा निर्मित स्थलाकृति है जिसकी रचना ज्यूजेन के विपरीत होती है। जब कोमल तथा कठोर चट्टानों के स्तर लम्बवत दिशा में मिलते हैं, तो पवन कठोर शैल की अपेक्षा मुलायम शैल को शीघ्र अपरदित करके उड़ा ले जाती है। इस प्रकार कठोर शैलों के मध्य कोमल शैलों के अपरदित होकर उड़ जाने के कारण चट्टानों के भाग खड़े रह जाते हैं। इन शैलों के पार्श्व में पवन द्वारा कटाव होने से नालियाँ बन जाती है। इस तरह के स्थलरूप को यारडंग कहते हैं। यारडंग का निर्माण निश्चित रूप से पवन के अपघर्षण कार्य द्वारा होता है। पवन द्वारा अपरदनात्मक स्थलरूप– अपवाह बेसिन या वात गर्त, इन्सेलबर्ग, छत्रकशिला, भू स्तम्भ, ज्यूजेन, यारडंग, ड्राइकांटर, जालक या जालीदार शिला, पुल तथा खिड़की आदि। पवन द्वारा निक्षेपणात्मक स्थलरूप–बालुका स्तूप, सीफ, बरखान, लोयस, बालसन, प्लेया, बजादा तथा पेडीमेन्ट आदि।

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यारडंग पवन के अपरदन द्वारा निर्मित स्थलाकृति है जिसकी रचना ज्यूजेन के विपरीत होती है। जब कोमल तथा कठोर चट्टानों के स्तर लम्बवत दिशा में मिलते हैं, तो पवन कठोर शैल की अपेक्षा मुलायम शैल को शीघ्र अपरदित करके उड़ा ले जाती है। इस प्रकार कठोर शैलों के मध्य कोमल शैलों के अपरदित होकर उड़ जाने के कारण चट्टानों के भाग खड़े रह जाते हैं। इन शैलों के पार्श्व में पवन द्वारा कटाव होने से नालियाँ बन जाती है। इस तरह के स्थलरूप को यारडंग कहते हैं। यारडंग का निर्माण निश्चित रूप से पवन के अपघर्षण कार्य द्वारा होता है। पवन द्वारा अपरदनात्मक स्थलरूप– अपवाह बेसिन या वात गर्त, इन्सेलबर्ग, छत्रकशिला, भू स्तम्भ, ज्यूजेन, यारडंग, ड्राइकांटर, जालक या जालीदार शिला, पुल तथा खिड़की आदि। पवन द्वारा निक्षेपणात्मक स्थलरूप–बालुका स्तूप, सीफ, बरखान, लोयस, बालसन, प्लेया, बजादा तथा पेडीमेन्ट आदि।