search
Q: पंडित देखहु मन में जानी। कहु धौं छूति कहाँ से उपजी, तबहिं छूति तुम मानी।। एकहि पाट सकल बैठाए, छूति लेत धौं काकी। छूतिहि जेवन छूतिहि अँचवन, छूतिहि जग उपजाया? कहैं कबीर ते छूति विवरजित, जाके संग न माया। आपके विचार में शिक्षक को इस दोहे की व्याख्या छात्रों के समक्ष किस प्रकार करनी चाहिए ?
  • A. पवित्रता तथा अपवित्रता की अवधारणा जन्म से ही विरासत मिलती है।
  • B. पवित्रता तथा अपवित्रता कार्य की प्रकृति से निर्धारित होते हैं।
  • C. अस्पृश्यता का विचार एक सामाजिक रचना है तथा हमारे विचारों और धारणाओं से निर्धारित होती है।
  • D. सामाजिक समूहों के बीच विषमता समाज की क्रियाशील बनाए रखने में निर्णायक भूमिका निभाती है।
Correct Answer: Option C - पंडित देखहु मन में जानी। कहु धौं छूति कहाँ से उपजी, तबहिं छूति तुम मानी।। एकहि पाट सकल बैठाए, छूति लेत धौं काकी। छूतिहि जेवन छूतिहि अँचवन, छूतिहि जग उपजाया। कहैं कबीर ते छूति विवरजित, जाके संग न माया। शिक्षक को इस दोहे की व्याख्या छात्रों के समक्ष ‘अस्पृश्ता का विचार एक सामाजिक रचना है तथा हमारे विचारों और धारणाओं से निर्धारित होती है’ इस प्रकार करनी चाहिए।
C. पंडित देखहु मन में जानी। कहु धौं छूति कहाँ से उपजी, तबहिं छूति तुम मानी।। एकहि पाट सकल बैठाए, छूति लेत धौं काकी। छूतिहि जेवन छूतिहि अँचवन, छूतिहि जग उपजाया। कहैं कबीर ते छूति विवरजित, जाके संग न माया। शिक्षक को इस दोहे की व्याख्या छात्रों के समक्ष ‘अस्पृश्ता का विचार एक सामाजिक रचना है तथा हमारे विचारों और धारणाओं से निर्धारित होती है’ इस प्रकार करनी चाहिए।

Explanations:

पंडित देखहु मन में जानी। कहु धौं छूति कहाँ से उपजी, तबहिं छूति तुम मानी।। एकहि पाट सकल बैठाए, छूति लेत धौं काकी। छूतिहि जेवन छूतिहि अँचवन, छूतिहि जग उपजाया। कहैं कबीर ते छूति विवरजित, जाके संग न माया। शिक्षक को इस दोहे की व्याख्या छात्रों के समक्ष ‘अस्पृश्ता का विचार एक सामाजिक रचना है तथा हमारे विचारों और धारणाओं से निर्धारित होती है’ इस प्रकार करनी चाहिए।