Correct Answer:
Option B - रूपकस्य ‘प्रकरणं’ भेदोऽस्ति मृच्छकटिकम्।
‘मृच्छकटिकम्’ रूपक का ‘प्रकरण’ भेद है इसकी कथावस्तु कविकल्पित है। विप्र, अमात्य अथवा वणिक् धीरप्रशान्त कोटि का नायक तथा शृङ्गार रस अङ्गी होता है और नायिका कुलजा, वेश्या दो होती हैं।
नायिका के आधार पर प्रकरण तीन प्रकार का होता है-
(1) कुलजा नायिका युक्त (2) वेश्या नायिका युक्त तथा
(3) कुलजा-वेश्या नायिका युक्त। अत: ‘मृच्छकटिकम्’ कुलजा-वेश्या, नायिका युक्त प्रकरण है।
नाटक, व्यायोग तथा ईहामृग आदि ये दस रूपक के भेद में से हैं।
नाटकमथ प्रकरणं भाण-व्यायोग समवकार डिमा:।
ईहामृगाङ्कवीथ्य: प्रहसनमिति रूपकाणि दश।।
(साहित्यदर्पण)
B. रूपकस्य ‘प्रकरणं’ भेदोऽस्ति मृच्छकटिकम्।
‘मृच्छकटिकम्’ रूपक का ‘प्रकरण’ भेद है इसकी कथावस्तु कविकल्पित है। विप्र, अमात्य अथवा वणिक् धीरप्रशान्त कोटि का नायक तथा शृङ्गार रस अङ्गी होता है और नायिका कुलजा, वेश्या दो होती हैं।
नायिका के आधार पर प्रकरण तीन प्रकार का होता है-
(1) कुलजा नायिका युक्त (2) वेश्या नायिका युक्त तथा
(3) कुलजा-वेश्या नायिका युक्त। अत: ‘मृच्छकटिकम्’ कुलजा-वेश्या, नायिका युक्त प्रकरण है।
नाटक, व्यायोग तथा ईहामृग आदि ये दस रूपक के भेद में से हैं।
नाटकमथ प्रकरणं भाण-व्यायोग समवकार डिमा:।
ईहामृगाङ्कवीथ्य: प्रहसनमिति रूपकाणि दश।।
(साहित्यदर्पण)