Correct Answer:
Option D - ‘स्पृहेरीप्सित:’ नास्ति अपादानसंज्ञाविधायकं सूत्रम्।
अर्थात् ‘स्पृहेरीप्सित:’ अपादान संज्ञा विधायक सूत्र नहीं है। यह सम्प्रदान संज्ञा विधायक सूत्र है, अत: स्पृह् धातु का प्रयोग होने पर जिसे चाहा जाता है उसकी सम्प्रदान संज्ञा और सम्प्रदाने चतुर्थी से चतुर्थी विभक्ति होती है जैसे- ‘पुष्पेभ्य: स्पृहयति’ लेकिन जब किसी वस्तु को विशेष रूप से चाहा जाता है तब उसकी कर्मसंज्ञा होती है और कर्मणि द्वितीया से द्वितीया विभक्ति की जाती है जैसे- बालक: पुस्तकं स्पृहति। अन्य तीनों विकल्प ‘अपादानसंज्ञाविधायक’ सूत्र हैं।
D. ‘स्पृहेरीप्सित:’ नास्ति अपादानसंज्ञाविधायकं सूत्रम्।
अर्थात् ‘स्पृहेरीप्सित:’ अपादान संज्ञा विधायक सूत्र नहीं है। यह सम्प्रदान संज्ञा विधायक सूत्र है, अत: स्पृह् धातु का प्रयोग होने पर जिसे चाहा जाता है उसकी सम्प्रदान संज्ञा और सम्प्रदाने चतुर्थी से चतुर्थी विभक्ति होती है जैसे- ‘पुष्पेभ्य: स्पृहयति’ लेकिन जब किसी वस्तु को विशेष रूप से चाहा जाता है तब उसकी कर्मसंज्ञा होती है और कर्मणि द्वितीया से द्वितीया विभक्ति की जाती है जैसे- बालक: पुस्तकं स्पृहति। अन्य तीनों विकल्प ‘अपादानसंज्ञाविधायक’ सूत्र हैं।