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Q: निर्देश (प्र.सं. H-15 से H-20 तक) : इस खंड में नीचे दिए गए गद्यांश से सम्बन्धित प्रश्न दिए गए हैं। सही विकल्प चुनकर उत्तर पत्रक में अंकित कीजिये। विकास क्रम में पशुता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और मनुष्यता हमारे युग-युगांतर के अनवतर अध्यवसाय से अर्जित अमूल्य निधि। इसी से हम अपने पूर्व स्वप्न के लिए, सामंजस्यपूर्ण आदर्श के लिए और भावनाओं के लिए प्राण की बाजी लगाते रहे हैं। जब हम से ऐसा करने की शक्ति शेष नहीं रह जाती तब हम एक मिथ्या दम्भ के साथ पशुता की ओर लौट चलते हैं क्योंकि वहाँ पहुँचने के लिए न किसी पराक्रम की आवश्यकता है और न साधन की। हम अपने शरीर को निश्चेष्ट छोड़कर हिमालय के शिखर से पाताल की गहराई तक सहज ही लुढ़कते चले आ सकते हैं। परंतु उसे ऊंचाई के सहस्र अंशो तक पहुँचने में हमारे पाँव काँपने लगेंगे, साँस फूलने लगेगी और आँखों के सामने अंधेरा छा जाएगा। प्रारम्भ में मुद्रित अंश आशय है कि
  • A. मनुष्यता मनुष्य की अमूल्य निधि है
  • B. विकास क्रम का नतीजा है कि हम पशु से मनुष्य बन गए
  • C. जन्म से पशु और मनुष्य में कोई अंतर नहीं है
  • D. युगांतर की साधना से मनुष्य पशुता से ऊपर उठकर मनुष्यता के गुण प्राप्त कर सकता है
  • E. उपर्युक्त में से कोई नहीं
Correct Answer: Option D - प्रारम्भ में मुद्रित अंश का आशय है कि- ‘युगान्तर की साधना से मनुष्य पशुता से ऊपर उठकर मनुष्यता के गुण प्राप्त कर सकता है।’
D. प्रारम्भ में मुद्रित अंश का आशय है कि- ‘युगान्तर की साधना से मनुष्य पशुता से ऊपर उठकर मनुष्यता के गुण प्राप्त कर सकता है।’

Explanations:

प्रारम्भ में मुद्रित अंश का आशय है कि- ‘युगान्तर की साधना से मनुष्य पशुता से ऊपर उठकर मनुष्यता के गुण प्राप्त कर सकता है।’