Q: निर्देश (61-69): निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के सही/सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए। गाँवों और शहरों में रहते हुए मनुष्य अपने ग्रह के मूल स्वरूप को प्राय: भूल बैठा है। इसका सही अंदाज तभी लग सकता है जब वह किसी लंबी समुद्री यात्रा पर निकल जाए। चारों ओर पानी ही पानी, पानी का अनंत विस्तार। तब पहली बार उसके सामने यह तथ्य उजागर होता है कि उसकी दुनिया पानी की दुनिया है। वह एक ऐसे ग्रह पर निवास करता है, जिस पर पानी का आधिपत्य है। समुद्र ही अपने पानी को साफ करके, उसका खारापन दूर करके हमें भेजता है। अगर वह पानी भेजना बंद कर दे तो जीवन समाप्त हो जाएगा। वह आज भी हमारा पालन-पोषण कर रहा है। ऐसा नहीं है कि समुद्र (मंथन) से एक ही बार अमृत निकला था। अमृत हर बर निकलता है और वर्षा के रूप में पूरी धरती पर बरसता है। सूर्य की गरमी से तपकर समुद्र का पानी भाप बनता है। निराकार भाप ऊपर जाकर साकार बादल में ढल जाता है। इन बादलों को मानसून की हवाएँ बहुत दूर की जगहों तक ले जाती हैं। जब ऊँचे पहाड़ों या घने जंगलों तक मानसून पहुँचता है तो वहाँ की ठंडक पाकर ठहर जाता है। पहाड़ और वन मानो कहते हैं कि अब से तुम्हारी बाट जोह रहे हैं। पानी बनकर तप्त धरा को तृप्त करो। नवजीवन का संचार करो। गद्यांश के अनुसार मनुष्य को
A.
जल की महत्ता समझनी चाहिए।
B.
समुद्र की महत्ता समझनी चाहिए।
C.
बादलों को बरसने से रोकना चाहिए।
D.
वन और पहाड़ों पर घूमना चाहिए।
Correct Answer:
Option A - गद्यांश के अनुसार मनुष्य को जल की महत्ता समझनी चाहिए। जल ही जीवन है। अत: अगर हम जल संरक्षण नहीं करेंगे तो आने वाले समय में बिना जल के जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है।
A. गद्यांश के अनुसार मनुष्य को जल की महत्ता समझनी चाहिए। जल ही जीवन है। अत: अगर हम जल संरक्षण नहीं करेंगे तो आने वाले समय में बिना जल के जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है।
Explanations:
गद्यांश के अनुसार मनुष्य को जल की महत्ता समझनी चाहिए। जल ही जीवन है। अत: अगर हम जल संरक्षण नहीं करेंगे तो आने वाले समय में बिना जल के जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है।
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