Correct Answer:
Option B - रेशम कीट अपनी मादा को उसकी गंध से कई किलोमीटर दूर से ही पहचान (ढूँढ़) लेता हैं। मादा रेशम कीट अंडे देती है जिनसे लार्वा निकलते हैं जो कैटरपिलर/इल्ली या रेशम कीट कहलाते हैं। ये आकार में वृद्धि करते हैं और जब कैटरपिलर अपने जीवन चक्र की अगली अवस्था में प्रवेश करने के लिए तैयार होता है, तो प्यूपा/कोशित कहलाता है जो अपने इर्द-गिर्द एक जाल बुन लेता है। यह जाल उसे अपने स्थान में बने रहने में सहायता करता है।
रेशम प्राप्त करने के लिए शहतूत के पेड़ों पर रेशम कीटों को पाला जाता है और उनके कोकूनों को एकत्रित करके रेशम के फाइबर प्राप्त किए जाते हैं।
नोट:- रेशम कीट पालन के अध्ययन को सेरीकल्चर कहा जाता है।
B. रेशम कीट अपनी मादा को उसकी गंध से कई किलोमीटर दूर से ही पहचान (ढूँढ़) लेता हैं। मादा रेशम कीट अंडे देती है जिनसे लार्वा निकलते हैं जो कैटरपिलर/इल्ली या रेशम कीट कहलाते हैं। ये आकार में वृद्धि करते हैं और जब कैटरपिलर अपने जीवन चक्र की अगली अवस्था में प्रवेश करने के लिए तैयार होता है, तो प्यूपा/कोशित कहलाता है जो अपने इर्द-गिर्द एक जाल बुन लेता है। यह जाल उसे अपने स्थान में बने रहने में सहायता करता है।
रेशम प्राप्त करने के लिए शहतूत के पेड़ों पर रेशम कीटों को पाला जाता है और उनके कोकूनों को एकत्रित करके रेशम के फाइबर प्राप्त किए जाते हैं।
नोट:- रेशम कीट पालन के अध्ययन को सेरीकल्चर कहा जाता है।