Q: निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिएः (प्र. सं. 64-69) हँसी भीतरी आनंद का बाहरी चिह्न है। जीवन की सबसे प्यारी और उत्तम-से-उत्तम वस्तु एक बार हँस लेना तथा शरीर को अच्छा रखने की अच्छी-से-अच्छी दवा एक बार खिलखिला उठना है। पुराने लोग कह गए हैं कि हँसो और पेट पुâलाओं। हँसी कितने ही कला-कौशलों से भली है। जितना ही अधिक आनंद से हँसोगे उतनी ही आयु बढ़ेगी। एक यूनानी विद्वान कहता है कि सदा अपने कर्मों पर झीखने वाला हेरीक्लेस बहुत कम जिया, पर प्रसन्न मन डेमाक्रीटस 109वर्ष तक जिया। हँसी-खुशी ही का नाम जीवन है। जो रोते हैं, उनका जीवन व्यर्थ है। कवि कहता है - ‘जिंदगी जिंदादिली का नाम है, मुर्दादिल खाक जिया करते हैं।’ मनुष्य के शरीर के वर्णन पर एक विलायती विद्वान ने एक पुस्तक लिखी है। उसमें वह कहता है कि उत्तम सुअवसर की हँसी उदास-से-उदास मनुष्य के चित्त को प्रपुâल्लित कर देती है। आनंद एक ऐसा प्रबल इंजन है कि उससे शोक और दुःख की दीवारों को ढहा सकते हैं। प्राण-रक्षा के लिए सदा देशों में उत्तम-से-उत्तम उपाय मनुष्य के चित्त को प्रसन्न रखना है। सुयोग्य वै़़द्य अपने रोगी के कानों में आनंदरूपी मंत्र सुनाता है। एक उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
A.
हँसी-एक वरदान
B.
प्रसन्नता-एक वरदान
C.
कुशल वैद्य की कला
D.
हँसी दुःखनाशक है
Correct Answer:
Option B - उपर्युक्त गद्यांश के अनुसार इसका उपयुक्त शीर्षक ‘प्रसन्नता-एक वरदान’ होना चाहिए।
B. उपर्युक्त गद्यांश के अनुसार इसका उपयुक्त शीर्षक ‘प्रसन्नता-एक वरदान’ होना चाहिए।
Explanations:
उपर्युक्त गद्यांश के अनुसार इसका उपयुक्त शीर्षक ‘प्रसन्नता-एक वरदान’ होना चाहिए।
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