Correct Answer:
Option D - सूरदास, रसखान और मीराबाई तीनों कृष्ण भक्त कवि है। अत: उपर्युक्त में से एक से अधिक विकल्प सही है।
⇒ सूरदास-ह.प्र. द्विवेदी के अनुसार-‘‘सूरदास ही ब्रजभाषा के प्रथम कवि है और लीलागान का महान समुद्र ‘सूरसागर’ ही उसका प्रथम काव्य है।’’
सूरदास द्वारा रचित 25 ग्रंथ बताया जाता है जिसमें कि तीन ही उपलब्ध है जो इस प्रकार है-
(1) सूरसागर (2) सूरसारावली (3) साहित्य लहरी
⇒ सूरदास की रचनाओं का सर्वप्रथम संपादन कलकत्ता में सन् 1841 ई. में ‘रागकल्पद्रुम’’ नाम से हुआ है।
⇒ सूरदासकृत सूरसागर का उपजीव्य ‘भागवत महापुराण’ का दशम स्कन्ध है। सूरसागर में 4936 पद तथा 12 स्कन्ध है। हिन्दी साहित्य में ‘भ्रमरगीत’ काव्य परम्परा का प्रवर्तन सूरदास ने किया। सूरदास ने ‘सूरसागर’ में तीन भ्रमर गीतों की योजना की है। प्रथम भ्रमरगीत (पद संख्या 4078-4710) ही मुख्य है। शेष दो भ्रमरगीत (ख) पद संख्या 4711-4712) तथा (ग) 4713 कथात्मक है।
⇒ भ्रमरगीत में कुल 700 पद है। ‘भ्रमरगीत’ को उपलम्भ काव्य भी कहते है, शुक्ल जी ने इसे ‘ध्वनिकाव्य’ कहा है।
⇒ सूर सारावली में 1107 छन्द है। इसकी रचना संसार को होली का रूपक मानकर की गई है।
⇒ ‘साहित्य लहरी’ में अलंकार और नायिका भेदों के उदाहरण प्रस्तुत करने वाले 118 दृष्टिक्रूट पद है।
सूरदास को वात्सल्य रस का सम्राट कहा जाता है।
रसखान-रसखान का मूल नाम सैयद इब्राहिम था। सवैया छंद में कृष्णलीला का गान करने वाले प्रथम कवि रसखान है। इन्होंने गोस्वामी बिट्ठलनाथ से दीक्षा ली थी और ये तुलसीदास के समकालीन थे। इनके काव्य में शृंगार रस की प्रधानता है और वात्सल्य रस का भी चित्रण मिलता है। रसखान के विषय में भारतेन्दु ने लिखा था-‘इास मुसलमान हरिजनन पर केतिन हिन्दुन वारिए’।
रसखान की काव्य कृतियाँ-सुजान रसखान, प्रेम वाटिका, दानलीला, अष्टयाम (कृष्ण की दिनचर्या का वर्णन)
मीराबाई-मीराबाई ने कृष्ण की उपासना प्रियतम या पति के रूप में की है। इनकी भाषा राजस्थानी मिश्रित ब्रजभाषा है। इनकी भक्ति माधुर्य भाव की भक्ति है। रैदास इनके गुरू माने जाते है।
मीराबाई की रचनाएँ-गीत गोविन्द की टीका, नरसी जी का मायरा, राग सोरठा, राग गोविन्द, मलार राग, सत्यभामा नु रूसणं, मीरां की गरीबी, रूक्मणी मंगल।
D. सूरदास, रसखान और मीराबाई तीनों कृष्ण भक्त कवि है। अत: उपर्युक्त में से एक से अधिक विकल्प सही है।
⇒ सूरदास-ह.प्र. द्विवेदी के अनुसार-‘‘सूरदास ही ब्रजभाषा के प्रथम कवि है और लीलागान का महान समुद्र ‘सूरसागर’ ही उसका प्रथम काव्य है।’’
सूरदास द्वारा रचित 25 ग्रंथ बताया जाता है जिसमें कि तीन ही उपलब्ध है जो इस प्रकार है-
(1) सूरसागर (2) सूरसारावली (3) साहित्य लहरी
⇒ सूरदास की रचनाओं का सर्वप्रथम संपादन कलकत्ता में सन् 1841 ई. में ‘रागकल्पद्रुम’’ नाम से हुआ है।
⇒ सूरदासकृत सूरसागर का उपजीव्य ‘भागवत महापुराण’ का दशम स्कन्ध है। सूरसागर में 4936 पद तथा 12 स्कन्ध है। हिन्दी साहित्य में ‘भ्रमरगीत’ काव्य परम्परा का प्रवर्तन सूरदास ने किया। सूरदास ने ‘सूरसागर’ में तीन भ्रमर गीतों की योजना की है। प्रथम भ्रमरगीत (पद संख्या 4078-4710) ही मुख्य है। शेष दो भ्रमरगीत (ख) पद संख्या 4711-4712) तथा (ग) 4713 कथात्मक है।
⇒ भ्रमरगीत में कुल 700 पद है। ‘भ्रमरगीत’ को उपलम्भ काव्य भी कहते है, शुक्ल जी ने इसे ‘ध्वनिकाव्य’ कहा है।
⇒ सूर सारावली में 1107 छन्द है। इसकी रचना संसार को होली का रूपक मानकर की गई है।
⇒ ‘साहित्य लहरी’ में अलंकार और नायिका भेदों के उदाहरण प्रस्तुत करने वाले 118 दृष्टिक्रूट पद है।
सूरदास को वात्सल्य रस का सम्राट कहा जाता है।
रसखान-रसखान का मूल नाम सैयद इब्राहिम था। सवैया छंद में कृष्णलीला का गान करने वाले प्रथम कवि रसखान है। इन्होंने गोस्वामी बिट्ठलनाथ से दीक्षा ली थी और ये तुलसीदास के समकालीन थे। इनके काव्य में शृंगार रस की प्रधानता है और वात्सल्य रस का भी चित्रण मिलता है। रसखान के विषय में भारतेन्दु ने लिखा था-‘इास मुसलमान हरिजनन पर केतिन हिन्दुन वारिए’।
रसखान की काव्य कृतियाँ-सुजान रसखान, प्रेम वाटिका, दानलीला, अष्टयाम (कृष्ण की दिनचर्या का वर्णन)
मीराबाई-मीराबाई ने कृष्ण की उपासना प्रियतम या पति के रूप में की है। इनकी भाषा राजस्थानी मिश्रित ब्रजभाषा है। इनकी भक्ति माधुर्य भाव की भक्ति है। रैदास इनके गुरू माने जाते है।
मीराबाई की रचनाएँ-गीत गोविन्द की टीका, नरसी जी का मायरा, राग सोरठा, राग गोविन्द, मलार राग, सत्यभामा नु रूसणं, मीरां की गरीबी, रूक्मणी मंगल।