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Q: ‘कामार्ता हि प्रकृतिकृपणाश्चेतनाचेतनेषु’ इतीयं सूक्तिर्विद्यते
  • A. मेघदूते
  • B. उत्तररामचरिते
  • C. अभिज्ञानशाकुन्तले
  • D. नीतिशतके
Correct Answer: Option A - ‘कामार्ता हि प्रकृतिकृपणाश्चेतनाचेतनेषु’ इतीयं सूक्ति: मेघदूते विद्यते। यह सूक्ति महाकवि कालिदास कृत मेघदूतम् की है यह एक खण्ड काव्य है। जो दो भागों में विभक्त है (1) पूर्वमेघ (2) उत्तरमेघ। इसका मुख्य रस विप्रलम्भ शृङ्गार है, छन्द मन्दाक्रान्ता है। इसका नायक यक्ष है और नायिका यक्षिणी है। ‘कामार्ता हि प्रकृतिकृपणाश्चेतनाचेतनेषु’ पूर्व मेघ की सूक्ति है। सूक्ति का अर्थ है कामपीडि़त जन (लोग) चेतन और जड़ के विषय में स्वभाव से ही दीन होते हैं।
A. ‘कामार्ता हि प्रकृतिकृपणाश्चेतनाचेतनेषु’ इतीयं सूक्ति: मेघदूते विद्यते। यह सूक्ति महाकवि कालिदास कृत मेघदूतम् की है यह एक खण्ड काव्य है। जो दो भागों में विभक्त है (1) पूर्वमेघ (2) उत्तरमेघ। इसका मुख्य रस विप्रलम्भ शृङ्गार है, छन्द मन्दाक्रान्ता है। इसका नायक यक्ष है और नायिका यक्षिणी है। ‘कामार्ता हि प्रकृतिकृपणाश्चेतनाचेतनेषु’ पूर्व मेघ की सूक्ति है। सूक्ति का अर्थ है कामपीडि़त जन (लोग) चेतन और जड़ के विषय में स्वभाव से ही दीन होते हैं।

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‘कामार्ता हि प्रकृतिकृपणाश्चेतनाचेतनेषु’ इतीयं सूक्ति: मेघदूते विद्यते। यह सूक्ति महाकवि कालिदास कृत मेघदूतम् की है यह एक खण्ड काव्य है। जो दो भागों में विभक्त है (1) पूर्वमेघ (2) उत्तरमेघ। इसका मुख्य रस विप्रलम्भ शृङ्गार है, छन्द मन्दाक्रान्ता है। इसका नायक यक्ष है और नायिका यक्षिणी है। ‘कामार्ता हि प्रकृतिकृपणाश्चेतनाचेतनेषु’ पूर्व मेघ की सूक्ति है। सूक्ति का अर्थ है कामपीडि़त जन (लोग) चेतन और जड़ के विषय में स्वभाव से ही दीन होते हैं।