Correct Answer:
Option A - इन्द्रियेभ्य: परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मन: ।
मनसस्तु परा बुद्धिबुद्धेरात्मा महान् पर: ।।
यह उक्ति कठोपनिषद् के प्रथम अध्याय के तृतीय वल्ली की है।
इसमें आत्मतत्व का विशद विवेचन किया गया है।
A. इन्द्रियेभ्य: परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मन: ।
मनसस्तु परा बुद्धिबुद्धेरात्मा महान् पर: ।।
यह उक्ति कठोपनिषद् के प्रथम अध्याय के तृतीय वल्ली की है।
इसमें आत्मतत्व का विशद विवेचन किया गया है।
Explanations:
इन्द्रियेभ्य: परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मन: ।
मनसस्तु परा बुद्धिबुद्धेरात्मा महान् पर: ।।
यह उक्ति कठोपनिषद् के प्रथम अध्याय के तृतीय वल्ली की है।
इसमें आत्मतत्व का विशद विवेचन किया गया है।
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