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Q: बिहारीलाल किस राजा के दरबार में थे?
  • A. महाराज जयसिंह
  • B. महाराज जसवन्तसिंह
  • C. महाराज भावसिंह
  • D. उपर्युक्त में से एक से अधिक
  • E. उपर्युक्त में से कोई नहीं
Correct Answer: Option A - बिहारीलाल मिर्जा राजा जय सिंह (जयपुर) के दरबार में थे। ⇒ बिहारी रीतिकाल के रीतिसिद्ध काव्य धारा के प्रमुख कवि है। इनके गुरु नरहरिदास थे तथा ये निम्बार्क सम्प्रदाय में दीक्षित हुए थे। बिहारी लाल की एक मात्र रचना ‘बिहारी सतसई’ दोहा छन्द में रचित है। इसकी भाषा परिष्ठित साहित्यिक ब्रजभाषा है। बिहारीलाल के समस्त दोहों की संख्या 719 है, किन्तु जगन्नाथ दास रत्नाकर ने इनके दोहों की संख्या 713 माना हैं। बिहारी लाल के पुत्र कृष्ण लाल ने बिहारी सतसई की टीका सर्वप्रथम सवैया छन्द में ब्रजभाषा में लिखी। ⇒ आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने बिहारीलाल को रसवादी जबकि नगेन्द्र के ध्वनिवादी माना है। श्री राधाचरण गोस्वामी ने बिहारी को ‘पीयूषवर्षी मेघ’ की उपमा दी है। ⇒ जगन्नाथदास रत्नाकर ने बिहारी रत्नाकर (1921) में हिन्दी खड़ी बोली में सर्वश्रेष्ठ टीका लिखी। ⇒ बिहारी की ऊहात्मक पंक्तियों पर फारसी कविता का प्रभाव माना जाता है।
A. बिहारीलाल मिर्जा राजा जय सिंह (जयपुर) के दरबार में थे। ⇒ बिहारी रीतिकाल के रीतिसिद्ध काव्य धारा के प्रमुख कवि है। इनके गुरु नरहरिदास थे तथा ये निम्बार्क सम्प्रदाय में दीक्षित हुए थे। बिहारी लाल की एक मात्र रचना ‘बिहारी सतसई’ दोहा छन्द में रचित है। इसकी भाषा परिष्ठित साहित्यिक ब्रजभाषा है। बिहारीलाल के समस्त दोहों की संख्या 719 है, किन्तु जगन्नाथ दास रत्नाकर ने इनके दोहों की संख्या 713 माना हैं। बिहारी लाल के पुत्र कृष्ण लाल ने बिहारी सतसई की टीका सर्वप्रथम सवैया छन्द में ब्रजभाषा में लिखी। ⇒ आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने बिहारीलाल को रसवादी जबकि नगेन्द्र के ध्वनिवादी माना है। श्री राधाचरण गोस्वामी ने बिहारी को ‘पीयूषवर्षी मेघ’ की उपमा दी है। ⇒ जगन्नाथदास रत्नाकर ने बिहारी रत्नाकर (1921) में हिन्दी खड़ी बोली में सर्वश्रेष्ठ टीका लिखी। ⇒ बिहारी की ऊहात्मक पंक्तियों पर फारसी कविता का प्रभाव माना जाता है।

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बिहारीलाल मिर्जा राजा जय सिंह (जयपुर) के दरबार में थे। ⇒ बिहारी रीतिकाल के रीतिसिद्ध काव्य धारा के प्रमुख कवि है। इनके गुरु नरहरिदास थे तथा ये निम्बार्क सम्प्रदाय में दीक्षित हुए थे। बिहारी लाल की एक मात्र रचना ‘बिहारी सतसई’ दोहा छन्द में रचित है। इसकी भाषा परिष्ठित साहित्यिक ब्रजभाषा है। बिहारीलाल के समस्त दोहों की संख्या 719 है, किन्तु जगन्नाथ दास रत्नाकर ने इनके दोहों की संख्या 713 माना हैं। बिहारी लाल के पुत्र कृष्ण लाल ने बिहारी सतसई की टीका सर्वप्रथम सवैया छन्द में ब्रजभाषा में लिखी। ⇒ आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने बिहारीलाल को रसवादी जबकि नगेन्द्र के ध्वनिवादी माना है। श्री राधाचरण गोस्वामी ने बिहारी को ‘पीयूषवर्षी मेघ’ की उपमा दी है। ⇒ जगन्नाथदास रत्नाकर ने बिहारी रत्नाकर (1921) में हिन्दी खड़ी बोली में सर्वश्रेष्ठ टीका लिखी। ⇒ बिहारी की ऊहात्मक पंक्तियों पर फारसी कविता का प्रभाव माना जाता है।