Correct Answer:
Option B - वनगजा: शुष्के : तृणै: बलिन: भवन्ति। अर्थात् वनहाथी सूखे तिनकों को खाकर बलवान् होते हैं। सर्प वायु (पवनं) पीते हैं और वे दुर्बल नहीं होते है। कन्दमूल फलों को खाकर मुनिवर अपना समय बिताते हैं। परन्तु सन्तोष ही मनुष्य का श्रेष्ठ खजाना है।
B. वनगजा: शुष्के : तृणै: बलिन: भवन्ति। अर्थात् वनहाथी सूखे तिनकों को खाकर बलवान् होते हैं। सर्प वायु (पवनं) पीते हैं और वे दुर्बल नहीं होते है। कन्दमूल फलों को खाकर मुनिवर अपना समय बिताते हैं। परन्तु सन्तोष ही मनुष्य का श्रेष्ठ खजाना है।
Explanations:
वनगजा: शुष्के : तृणै: बलिन: भवन्ति। अर्थात् वनहाथी सूखे तिनकों को खाकर बलवान् होते हैं। सर्प वायु (पवनं) पीते हैं और वे दुर्बल नहीं होते है। कन्दमूल फलों को खाकर मुनिवर अपना समय बिताते हैं। परन्तु सन्तोष ही मनुष्य का श्रेष्ठ खजाना है।
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