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Q: अधोलिखितान् पद्यान् पठित्वा प्रश्नानां (25-30) विकल्पात्मकोत्तरेभ्य: उचिततमं उत्तरं चिनुत । जाड्यं धियो हरति सिञचति वाचि सत्यम्, मानोन्नतिं दिशति पापमपाकरोति। चेत: पसादयति दिक्षु तनोति कीर्तिम्, सत्सङ्गति: कथय किं न करोति पुंसाम् ।।1।। सर्पा: पिबन्ति पवनं न च दुर्बलास्ते, शुष्के : तृणै: वनगजा: बलिन: भवन्ति। सन्तोष एव पुरुषस्य परं निधानम् ।।2।। परिवर्तिनि संसारे मृत: को वा न जायते। स जातो येन जातेन याति वंश: समुन्नतिम्। मृग-मीन-सज्जनानां तृण-जल-सन्तोष विहत वृत्तीनाम्। लुब्धक-धीवर-पिशुना निष्कारणवैरिणो जगति।।4।। वैरणा नहि संदध्यात् सुश्लिष्टनापि सन्धिना। सुतप्तमपि पानीयं शमयत्येव पावकम् ।।5।। वनगजा: केन बलिन: भवन्ति?
  • A. कन्दमूलै:
  • B. शुष्के : तृणै:
  • C. पुष्पै:
  • D. पवनेन
Correct Answer: Option B - वनगजा: शुष्के : तृणै: बलिन: भवन्ति। अर्थात् वनहाथी सूखे तिनकों को खाकर बलवान् होते हैं। सर्प वायु (पवनं) पीते हैं और वे दुर्बल नहीं होते है। कन्दमूल फलों को खाकर मुनिवर अपना समय बिताते हैं। परन्तु सन्तोष ही मनुष्य का श्रेष्ठ खजाना है।
B. वनगजा: शुष्के : तृणै: बलिन: भवन्ति। अर्थात् वनहाथी सूखे तिनकों को खाकर बलवान् होते हैं। सर्प वायु (पवनं) पीते हैं और वे दुर्बल नहीं होते है। कन्दमूल फलों को खाकर मुनिवर अपना समय बिताते हैं। परन्तु सन्तोष ही मनुष्य का श्रेष्ठ खजाना है।

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वनगजा: शुष्के : तृणै: बलिन: भवन्ति। अर्थात् वनहाथी सूखे तिनकों को खाकर बलवान् होते हैं। सर्प वायु (पवनं) पीते हैं और वे दुर्बल नहीं होते है। कन्दमूल फलों को खाकर मुनिवर अपना समय बिताते हैं। परन्तु सन्तोष ही मनुष्य का श्रेष्ठ खजाना है।