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Q: अधोलिखितं गद्यांशं पठित्वा तदाधारित-प्रश्नानां (316-322) विकल्पात्मकोत्तरेभ्यः उचिततमम् उत्तरं चित्वा लिखत- उदयन: नाम कोऽपि भूप: आसीत्। एकदा स: निजभवने सुखं सुप्त:। तदा स: स्वप्ने त्रीन् मूषकान् अपश्यत्। तेषु एक: पुष्टाङ्ग, अपर: कृशतनु: तृतीयस्तु सर्वथा अन्ध: एव आसीत्। प्रात: प्रतिबुध्य उदयन: विख्यातं शकुनज्ञम् आहूय तम् अपृच्छत् ‘भद्र अद्य प्रत्यूषे मया एक: स्वप्न: दृष्ट:। अहं त्रीन् मूषकानपश्यम्। तेषु एक: पुष्टाङ्ग, अपर: कृशतनु: तृतीय: तु सर्वथा अन्ध: एव आसीत्। अस्य स्वप्नस्य क: अर्थ: इति कथय। शकुनज्ञ: प्रत्युत्पन्नमति: आसीत् स: नृपम् अवदत् हे राजन् ! य: पुष्टाङ्ग मूषक: तं त्वं स्वसचिवम् अवगच्छ। य: कृशतनु: मूषक: तम् आत्मन: प्रजाजनं मन्यस्व। य: सर्वथा अन्ध: तं तु आत्मानमेव अवगच्छ।स्वीकुरुष्व इति पदस्य समानार्थकः शब्द अनुच्छेदेऽस्मिन् प्रयुक्तः तच्चित्वा लिखत
  • A. धावतु
  • B. पठतु
  • C. मन्यस्व
  • D. न मन्यस्व
Correct Answer: Option C - अनुच्छेदेऽस्मिन् स्वीकुरुष्व इति पदस्य समानार्थक: शब्द: ‘मन्यस्व’ प्रयुक्त:। अर्थात् अनुच्छेद में ‘स्वीकुरुष्व’ शब्द का समानार्थक शब्द ‘मन्यस्व’ प्रयोग किया गया है। स्वीकुरुष्व पद आत्मनेपदी लोट् लकार मध्यम पुरुष एकवचन का है। ‘मन्यस्व’ पद भी आत्मनेपदी लोट् लकार मध्यम पुरुष एकवचन का है। दोनों शब्द समान अर्थों में प्रयोग किये जा सकते है।
C. अनुच्छेदेऽस्मिन् स्वीकुरुष्व इति पदस्य समानार्थक: शब्द: ‘मन्यस्व’ प्रयुक्त:। अर्थात् अनुच्छेद में ‘स्वीकुरुष्व’ शब्द का समानार्थक शब्द ‘मन्यस्व’ प्रयोग किया गया है। स्वीकुरुष्व पद आत्मनेपदी लोट् लकार मध्यम पुरुष एकवचन का है। ‘मन्यस्व’ पद भी आत्मनेपदी लोट् लकार मध्यम पुरुष एकवचन का है। दोनों शब्द समान अर्थों में प्रयोग किये जा सकते है।

Explanations:

अनुच्छेदेऽस्मिन् स्वीकुरुष्व इति पदस्य समानार्थक: शब्द: ‘मन्यस्व’ प्रयुक्त:। अर्थात् अनुच्छेद में ‘स्वीकुरुष्व’ शब्द का समानार्थक शब्द ‘मन्यस्व’ प्रयोग किया गया है। स्वीकुरुष्व पद आत्मनेपदी लोट् लकार मध्यम पुरुष एकवचन का है। ‘मन्यस्व’ पद भी आत्मनेपदी लोट् लकार मध्यम पुरुष एकवचन का है। दोनों शब्द समान अर्थों में प्रयोग किये जा सकते है।