Correct Answer:
Option B - अपभ्रंश में दोहा-काव्य की परम्परा का प्रारम्भ ‘जोइन्दु’ ने किया। ‘परमात्म प्रकाश’ एवं योगसार इनकी प्रमुख रचनाएँ हैं। दोनों रचनाएँ छठी सदी के धर्म दर्शन एवं इंद्रिय निग्रह को आधार मानकर लिखी गयी हैं।
हेमचंन्द्र अपने समय के सबसे प्रसिद्ध जैन आचार्य थे। इन्हें ‘प्राकृत का पाणिनी’ कहा जाता है। इनके प्रमुख ग्रन्थ हैं - शब्दानुशासन (प्राकृत व्याकरण), कुमारपालचरित, योगशास्त्र, छंदोनुशासन, देशीनाममाला कोश।
• धनपाल को मुंज ने ‘सरस्वती’ की उपाधि दी थी। इनका ग्रन्थ ‘भविष्यतकहा’ (10शतीं) है, जिसमें बहुविवाह के दुष्परिणाम के साथ-साथ साध्वी और कुटिल स्त्री का अंतर प्रकट किया है।
B. अपभ्रंश में दोहा-काव्य की परम्परा का प्रारम्भ ‘जोइन्दु’ ने किया। ‘परमात्म प्रकाश’ एवं योगसार इनकी प्रमुख रचनाएँ हैं। दोनों रचनाएँ छठी सदी के धर्म दर्शन एवं इंद्रिय निग्रह को आधार मानकर लिखी गयी हैं।
हेमचंन्द्र अपने समय के सबसे प्रसिद्ध जैन आचार्य थे। इन्हें ‘प्राकृत का पाणिनी’ कहा जाता है। इनके प्रमुख ग्रन्थ हैं - शब्दानुशासन (प्राकृत व्याकरण), कुमारपालचरित, योगशास्त्र, छंदोनुशासन, देशीनाममाला कोश।
• धनपाल को मुंज ने ‘सरस्वती’ की उपाधि दी थी। इनका ग्रन्थ ‘भविष्यतकहा’ (10शतीं) है, जिसमें बहुविवाह के दुष्परिणाम के साथ-साथ साध्वी और कुटिल स्त्री का अंतर प्रकट किया है।