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Q: अनुच्छेद को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों (प्र.क्र. 27-30) के उत्तर दीजिए। यदि हम किसी के बोझ को हल्का कर सकें , यदि हम किसी के खेद को कम कर सकें , यदि हम किसी के कष्ट को नष्ट कर सकें , यदि हम किसी के दु:ख में सहानुभूति की शीतल कोमल वर्षा कर सकें -तो इस प्रकार की मानसिक शक्ति से हमें जो लाभ प्राप्त होगा, वह अन्य किसी भी प्रकार की योग्यता से प्राप्त नहीं हो सकता। आशा का सूर्योदय होते ही निराशा की निशा लुप्त हो जाती है, मुस्कान तथा हँसी के प्रकट होते ही खिन्नता तथा उदासी दूर हो जाती है। उल्लास की भावना मन में आते ही चिंता नष्ट हो जाती है और दयालुता तथा परोपकार की भावना मन में आते ही अपना दु:ख दूर हो जाता है। आनंद से परिपूर्ण आत्मा वाले मनुष्य के आते ही लोग मुस्कान द्वारा उसका स्वागत करते हैं, उनसे वार्तालाप करते हुए असीम प्रसन्नता का अनुभव करते हैं और सम्पूर्ण वातावरण में हर्ष और प्रसन्नता की सुरभि-सी प्रसारित हो जाती है। यदि आप अपने काम-धंधे का भला और विकास करना चाहते हैं तो इससे अधिक अच्छा अन्य उपाय कोई नहीं हो सकता कि आप अपना स्वभाव प्रसन्नतामय, उल्लासमय और हर्ष-समन्वित बना लेें। चित्त में दूसरों की सेवा की भावना जाग्रत कर लें। सामाजिक संबंधों में सौमनस्य लाने के लिए इससे उत्तम उपाय है ही नहीं। उल्लास तथा परोपकार मन में लाते ही आपको व्यापार के पीछे नहीं भागना पड़ेगा, अपितु वह स्वयं आपकी ओर उमड़ा आएगा। मित्र आपसे मिलने के लिए लालायित रहेंगे और आपका व्यवसाय दिन-दूनी रात-चौगुनी गति से उन्नति करेगा। आपको व्यापार के पीछे नहीं भागना पड़ेगा, यदि आप-
  • A. व्यापार में चतुराई से काम करेंगे।
  • B. आनंद से परिपूर्ण आत्मा वाले मनुष्य से मिलेंगे।
  • C. अपना स्वभाव प्रसन्नतामय, उल्लासमय और हर्ष-समन्वित बना लेंगे।
  • D. जीवन में निराशा के कारणों का विश्लेषण करेंगे।
Correct Answer: Option C - उपर्युक्त अनुच्छेद के अनुसार यदि आप काम-धंधे का भला और विकास करना चाहते हैं तो इससे अधिक अच्छा अन्य उपाय कोई नहीं हो सकता कि आप अपना स्वभाव प्रसन्नतामय, उल्लासमय और हर्ष-समन्वित बना लें। अत: स्पष्ट होता है कि यदि आप अपना स्वभाव प्रसन्नतामय, उल्लासमय और हर्ष-समन्वित बना लेंगे तो आपको व्यापार के पीछे नही भागना पड़ेगा।
C. उपर्युक्त अनुच्छेद के अनुसार यदि आप काम-धंधे का भला और विकास करना चाहते हैं तो इससे अधिक अच्छा अन्य उपाय कोई नहीं हो सकता कि आप अपना स्वभाव प्रसन्नतामय, उल्लासमय और हर्ष-समन्वित बना लें। अत: स्पष्ट होता है कि यदि आप अपना स्वभाव प्रसन्नतामय, उल्लासमय और हर्ष-समन्वित बना लेंगे तो आपको व्यापार के पीछे नही भागना पड़ेगा।

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उपर्युक्त अनुच्छेद के अनुसार यदि आप काम-धंधे का भला और विकास करना चाहते हैं तो इससे अधिक अच्छा अन्य उपाय कोई नहीं हो सकता कि आप अपना स्वभाव प्रसन्नतामय, उल्लासमय और हर्ष-समन्वित बना लें। अत: स्पष्ट होता है कि यदि आप अपना स्वभाव प्रसन्नतामय, उल्लासमय और हर्ष-समन्वित बना लेंगे तो आपको व्यापार के पीछे नही भागना पड़ेगा।