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निर्देश (151-159): निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर पूछे गये प्रश्नों के सही/सबसे उपयुक्त वाले विकल्प को चुनिए। समय की उपेक्षा करने वालों को समय नष्ट कर देता है। महात्मा गाँधी सभी कार्य निर्धारित समय पर करते थे इसलिए अत्यंत व्यस्त होते हुए भी निरंतर प्रगति करते हुए सफलतम महान व्यक्तियों की श्रेणी में पहुँचे। जेम्स वॉट, मैडम क्यूरी और एडीसन ने समय के प्रत्येक पल का सही उपयोग कर संसार को महान आविष्कार प्रदान किए। समय का सदुपयोग भाग्य निर्माण की आधारशिला है। असमय कार्य करने वाले कायर और निरुद्यमी बन जाते हैं। अपने कर्तव्य कर्म को बिना विलंब किए करना ही समय का सदुपयोग है। ऐसा करने वाला ही समय का पारखी भी है। जो समय का सदुपयोग करना जान लेता है वह जीवन को सही ढंग से जीना सीख जाता है। हर व्यक्ति को पैसों की अपेक्षा समय का अधिक हिसाब रखना होगा । तभी वह अपने क्षेत्र में सफल हो पाएगा। भाग्य निर्माण की बुनियाद___________ है।
Object floats on water based on -
निम्नलिखित अल्फान्यूमेरिक क्रम का अध्ययन करें और निम्न प्रश्नों का उत्तर दें। @ 4 9 * 4 9 % 2 3 $ 2 1 5 7 ^ 9 3 5 = 8 5 2 5 6 D 1 8 5 ? 9 7 2 6 2 4 2 5 8 3 1 6 2 4 संख्या 2 के बाद एक विषम संख्या कितनी बार आती है?
भारतेन्दु ने यात्रावृत्त सम्बन्धी कौन सी रचना लिखी?
The term Biomagnification refers to : बायोमैग्निफिकेशन (जैव-आवद्र्धन) का अर्थ है :
इनमें से कौन-सा अनुच्छेद यह कहता है कि धर्म और भाषा के आधार पर आधारित अल्पसंख्यक अपने अनुसार शिक्षा संस्थानों को स्थापित कर चला सकते हैं?
प्रदत्तप्रश्नानां (प्रश्न संख्या(233-242) विकल्पोत्तरेषु समुचितम् उत्तरं चित्वा लिखत। अस्ति वाराणस्यां कर्पूरपटको नाम रजक:। स च एकदा अभिनववयस्कया वध्वा सह चिरं केलिं कृत्वा निर्भरमालिङ्ग्य प्रसुप्त:। तदनन्तरं तद्गृहद्रव्याणि हर्तुं चोर: प्रविष्ट:। तस्य प्राङ्गणे गर्दभो बद्धस्तिष्ठति कुक्कुरश्च उपविष्ट: अस्ति। अथ गर्दभ: श्वानमाह- सखे, भवतस्तावदयं व्यापार:। तत् किमिति। त्वम् उच्चै: शब्दं कृत्वा स्वामिनं न जागरयसि? कुक्कुरो ब्रूते-भद्र मम नियोगस्य चर्चा त्वया न कर्तव्या। त्वमेव किम् न जानासि यथा तस्य अहर्निशं गृहरक्षां करोमि। यतोऽयं चिरान्निवृत्तो ममोपयोगं न जानाति। तेनाधुनापि मम आहारदाने मन्दादर:। यतो विना विधुरदर्शनं स्वामिन उपजीविषु मन्दादरा भवन्ति। गर्दभो ब्रूते शृणु रे बर्बर। याचते कार्यकाले य: स किम् भृत्य: स किम् सुह्रत्? कुक्कुरो ब्रूते – शृणु तावत्। भृत्यान्संभाषयेद्यस्तु कार्यकाले स किम् प्रभु: यत:- आश्रितानां भृतौ स्वामिसेवायां धर्मसेवने। पुत्रस्योत्पादने चैव न सन्ति प्रतिहस्तका:।। ततो गर्दभ: सकोपमाह – अरे दुष्टमते! पापीयांस्त्वं यद्विपत्तौ स्वामिकार्योपेक्षां करोषि। भवतु तावत्। यथा स्वामी जागरिष्यति तन्मया कर्तव्यम्। यत: पृष्ठत: सेवयेदर्कम् जठरेण हुताशनम्। स्वामिनं सर्वभावेन परलोकममायया।। इत्युक्त्वा उच्चै: चीत्कारशब्दं कृतवान्। तत: रजक: तेन चीत्कारेण प्रबुद्धो निद्राभङ्गकोपात् उत्थाय गर्दभं लगुडेन ताडयामास। अतोऽहं ब्रवीमि- पराधिकारचर्चां य: कुर्यात् स्वामिहितेच्छया। स विषीदति चीत्कारात् गर्दभ: ताडितो यथा।। रजकस्य नाम–
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