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  • A. 1 and 2 only/केवल 1 और 2
  • B. 2 only/केवल 2
  • C. 1 and 3 only/केवल 1 और 3
  • D. 1, 2 and 3/1, 2 और 3
Correct Answer: Option D - भारत में पाश्चात्य शिक्षा का वास्तविक रूप से आरम्भ 1813 ई. के चार्टर द्वारा माना जाता है। हालाँकि 1813ई. से पहले ईसाई मिशनरी अधिकारिक तौर पर कुछ बुनियादी शिक्षाएँ लेकर आई थीं। चार्टर द्वारा भारतीयों की शिक्षा के लिए कम्पनी की सरकार प्रति वर्ष 1 लाख रूपये खर्च करने का निर्णय लिया। यद्यपि यह संशय भी बना रहा कि धन का उपयोग भारतीय भाषाओं और ज्ञान वृद्धि के लिए किया जाए, या भारत में पाश्चात्य शिक्षा प्रणाली को आरम्भ किया जाए। 1823 ई. में गवर्नर-जनरल इन काउंसिल ने ‘‘सार्वजनिक निर्देश की सामान्य समिति’’ नियुक्ति की जिसको शिक्षा के लिए 1 लाख रूपए देने की जिम्मेदारी थी। उस समिति में 10 यूरोपीय सदस्य शामिल थे जिनमें लॉर्ड मैकॉले अध्यक्ष थे। इनमें दो दल थे। एक प्राच्य विद्या समर्थक था जिसके नेता एच.टी. प्रिंसेप थे। प्राच्यविद, अरबी और संस्कृत के विद्यार्थियों के लिए आर्थिक सहयोग का समर्थन करते थे। दूसरी ओर था आंग्ल दल जो अंग्रेजी को शिक्षा के माध्यम के रूप में समर्थन देता था। आंग्ल शिक्षा के समर्थक संस्कृत और अरबी ग्रंथों के मुद्रण पर खर्च होने वाली राशि में कमी चाहते थे। दोनों दलों ने अपना विवाद गवर्नर जनरल के समक्ष रखा। अंत में 7 मार्च 1835 ई. के प्रस्ताव द्वारा मैकॉले का दृष्टिकोण अपना लिया गया कि भविष्य में कम्पनी की सरकार यूरोपीय साहित्य को अंग्रेजी माध्यम द्वारा उन्नत करने का प्रयत्न करें। इस प्रकार प्रश्न में दिये गए सभी विकल्प सही हैं।
D. भारत में पाश्चात्य शिक्षा का वास्तविक रूप से आरम्भ 1813 ई. के चार्टर द्वारा माना जाता है। हालाँकि 1813ई. से पहले ईसाई मिशनरी अधिकारिक तौर पर कुछ बुनियादी शिक्षाएँ लेकर आई थीं। चार्टर द्वारा भारतीयों की शिक्षा के लिए कम्पनी की सरकार प्रति वर्ष 1 लाख रूपये खर्च करने का निर्णय लिया। यद्यपि यह संशय भी बना रहा कि धन का उपयोग भारतीय भाषाओं और ज्ञान वृद्धि के लिए किया जाए, या भारत में पाश्चात्य शिक्षा प्रणाली को आरम्भ किया जाए। 1823 ई. में गवर्नर-जनरल इन काउंसिल ने ‘‘सार्वजनिक निर्देश की सामान्य समिति’’ नियुक्ति की जिसको शिक्षा के लिए 1 लाख रूपए देने की जिम्मेदारी थी। उस समिति में 10 यूरोपीय सदस्य शामिल थे जिनमें लॉर्ड मैकॉले अध्यक्ष थे। इनमें दो दल थे। एक प्राच्य विद्या समर्थक था जिसके नेता एच.टी. प्रिंसेप थे। प्राच्यविद, अरबी और संस्कृत के विद्यार्थियों के लिए आर्थिक सहयोग का समर्थन करते थे। दूसरी ओर था आंग्ल दल जो अंग्रेजी को शिक्षा के माध्यम के रूप में समर्थन देता था। आंग्ल शिक्षा के समर्थक संस्कृत और अरबी ग्रंथों के मुद्रण पर खर्च होने वाली राशि में कमी चाहते थे। दोनों दलों ने अपना विवाद गवर्नर जनरल के समक्ष रखा। अंत में 7 मार्च 1835 ई. के प्रस्ताव द्वारा मैकॉले का दृष्टिकोण अपना लिया गया कि भविष्य में कम्पनी की सरकार यूरोपीय साहित्य को अंग्रेजी माध्यम द्वारा उन्नत करने का प्रयत्न करें। इस प्रकार प्रश्न में दिये गए सभी विकल्प सही हैं।

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भारत में पाश्चात्य शिक्षा का वास्तविक रूप से आरम्भ 1813 ई. के चार्टर द्वारा माना जाता है। हालाँकि 1813ई. से पहले ईसाई मिशनरी अधिकारिक तौर पर कुछ बुनियादी शिक्षाएँ लेकर आई थीं। चार्टर द्वारा भारतीयों की शिक्षा के लिए कम्पनी की सरकार प्रति वर्ष 1 लाख रूपये खर्च करने का निर्णय लिया। यद्यपि यह संशय भी बना रहा कि धन का उपयोग भारतीय भाषाओं और ज्ञान वृद्धि के लिए किया जाए, या भारत में पाश्चात्य शिक्षा प्रणाली को आरम्भ किया जाए। 1823 ई. में गवर्नर-जनरल इन काउंसिल ने ‘‘सार्वजनिक निर्देश की सामान्य समिति’’ नियुक्ति की जिसको शिक्षा के लिए 1 लाख रूपए देने की जिम्मेदारी थी। उस समिति में 10 यूरोपीय सदस्य शामिल थे जिनमें लॉर्ड मैकॉले अध्यक्ष थे। इनमें दो दल थे। एक प्राच्य विद्या समर्थक था जिसके नेता एच.टी. प्रिंसेप थे। प्राच्यविद, अरबी और संस्कृत के विद्यार्थियों के लिए आर्थिक सहयोग का समर्थन करते थे। दूसरी ओर था आंग्ल दल जो अंग्रेजी को शिक्षा के माध्यम के रूप में समर्थन देता था। आंग्ल शिक्षा के समर्थक संस्कृत और अरबी ग्रंथों के मुद्रण पर खर्च होने वाली राशि में कमी चाहते थे। दोनों दलों ने अपना विवाद गवर्नर जनरल के समक्ष रखा। अंत में 7 मार्च 1835 ई. के प्रस्ताव द्वारा मैकॉले का दृष्टिकोण अपना लिया गया कि भविष्य में कम्पनी की सरकार यूरोपीय साहित्य को अंग्रेजी माध्यम द्वारा उन्नत करने का प्रयत्न करें। इस प्रकार प्रश्न में दिये गए सभी विकल्प सही हैं।