Correct Answer:
Option A - कम्युनिस्ट आंदोलन की शक्ति एवं बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए कानपुर में एक षड्यंत्र को आधार बनाकर कुछ कम्युनिस्टों (बोल्शेविक या साम्यवादी) पर मुकदमा चलाया गया। यह मुकदमा कानपुर षड्यंत्र केस के नाम से प्रसिद्ध है। ब्रिटिश सरकार ने 1924 ई. को एम. एन. रॉय, मुजफ्फर अहमद, श्रीपद अमृत डांगे, शौकत उस्मानी (उस्मानी), गुलाम शौकत हुसैन, रामचरण लाल शर्मा और शिंगार वेलु चेट्टियार पर मुकदमा चलाया। सरकार ने इन पर आरोप लगाया कि ये लोग षड्यंत्र रच रहें हैं। जिसका उद्देश्य भारत में क्रांतिकारी संगठन को स्थापित करना है और भारत से सम्राट की प्रभुसत्ता को समाप्त करना है। जब यह मुकदमा चला तो सिर्फ 4 व्यक्ति नलिनी गुप्ता, उस्मानी, डांगे और मुजफ्फर अहमद अदालत में पेश किए गए। एम.एन. रॉय व रामचरण लाल शर्मा भारत में नहीं थे। हुसैन सरकारी गवाह बन गए और सिंगार वेलुचेट्टियार पर उनकी बीमारी की वजह से मुकद्दमा नहीं चलाया गया। 20 मई 1924 ई. को फैसला सुनाया गया और चारों अभियुक्तों (मुजफ्फर अहमद, एस.ए. डांगे, शौकत उस्मानी तथा नलिनी गुप्ता) को 4-4 वर्ष की कड़ी सजा दी गई।
A. कम्युनिस्ट आंदोलन की शक्ति एवं बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए कानपुर में एक षड्यंत्र को आधार बनाकर कुछ कम्युनिस्टों (बोल्शेविक या साम्यवादी) पर मुकदमा चलाया गया। यह मुकदमा कानपुर षड्यंत्र केस के नाम से प्रसिद्ध है। ब्रिटिश सरकार ने 1924 ई. को एम. एन. रॉय, मुजफ्फर अहमद, श्रीपद अमृत डांगे, शौकत उस्मानी (उस्मानी), गुलाम शौकत हुसैन, रामचरण लाल शर्मा और शिंगार वेलु चेट्टियार पर मुकदमा चलाया। सरकार ने इन पर आरोप लगाया कि ये लोग षड्यंत्र रच रहें हैं। जिसका उद्देश्य भारत में क्रांतिकारी संगठन को स्थापित करना है और भारत से सम्राट की प्रभुसत्ता को समाप्त करना है। जब यह मुकदमा चला तो सिर्फ 4 व्यक्ति नलिनी गुप्ता, उस्मानी, डांगे और मुजफ्फर अहमद अदालत में पेश किए गए। एम.एन. रॉय व रामचरण लाल शर्मा भारत में नहीं थे। हुसैन सरकारी गवाह बन गए और सिंगार वेलुचेट्टियार पर उनकी बीमारी की वजह से मुकद्दमा नहीं चलाया गया। 20 मई 1924 ई. को फैसला सुनाया गया और चारों अभियुक्तों (मुजफ्फर अहमद, एस.ए. डांगे, शौकत उस्मानी तथा नलिनी गुप्ता) को 4-4 वर्ष की कड़ी सजा दी गई।