Correct Answer:
Option B - लैटेराइट मृदा का प्रथम अध्ययन ब्रिटिश भूगोलवेत्ता एफ. बुकानन द्वारा किया गया था। इस मिट्टी का नामकरण लैटिन शब्द ‘लैटर (later)’ से हुआ है जिसका अर्थ ‘ईंट (brick)’ होता है। ये मृदाएँ भीगी हुई स्थिति में काफी मुलायम होती हैं लेकिन सूखने के उपरान्त इनमें उच्च कड़ापन आ जाता है तथा ये ढेलेदार (Cloddy) हो जाती हैं। मानसूनी जलवायु तथा मौसमी वर्षा वाले क्षेत्रों की ये विशिष्ट मृदाएँ हैं। इन मृदाओं का निर्माण आर्द्र एवं शुष्क ऋतुओं की बारम्बारता से होने वाले सिलिकामय पदार्थों के निक्षालन के परिणामस्वरूप हुआ है। इसमें लोहे के ऑक्साइड की उपस्थिति इसे लाल रंग प्रदान करती है। इन मृदाओं का विकास मुख्यतया पठार के उच्च भागों में हुआ है। निम्न भागों की तुलना में ये मृदाएँ उच्च भागों में अपेक्षाकृत अधिक अम्लीय हैं। लैटेराइट मृदाएँ भारत के लगभग 12.2 मिलियन हेक्टयर क्षेत्र में फैली हैं तथा ये भारत की समस्त मृदाओं की 3.7 प्रतिशत हैं। ये मृदाएँ मुख्यत: पश्चिमी घाट की पहाड़ियों , मालाबार तटीय क्षेत्र, पूर्वी घाट, राजमहल की पहाड़ियों , सतपुड़ा, विंध्य, ओडिशा, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, पं. बंगाल, असोम तथा मेघालय की गारो पहाड़ियों में पायी जाती हैं। इन मृदाओं में जहाँ लोहे, एल्युमिनियम की प्रचुरता होती है वही इनमें नाइट्रोजन, फॉस्फेट , चूने और जैविक पदार्थों की कमी पायी जाती है। हालांकि इनकी उर्वरता निम्न है। इनमें मुख्यत: चावल, कहवा, रागी, गन्ने और काजू की खेती होती है। अवातित अवस्था (anaerobic stage) में मृदा में अधिकतम जल/नमी (सम्पृक्तावस्था) परन्तु न्यूनतम वायु की दशा को मिट्टियों की अवातित अवस्था कहते हैं।
B. लैटेराइट मृदा का प्रथम अध्ययन ब्रिटिश भूगोलवेत्ता एफ. बुकानन द्वारा किया गया था। इस मिट्टी का नामकरण लैटिन शब्द ‘लैटर (later)’ से हुआ है जिसका अर्थ ‘ईंट (brick)’ होता है। ये मृदाएँ भीगी हुई स्थिति में काफी मुलायम होती हैं लेकिन सूखने के उपरान्त इनमें उच्च कड़ापन आ जाता है तथा ये ढेलेदार (Cloddy) हो जाती हैं। मानसूनी जलवायु तथा मौसमी वर्षा वाले क्षेत्रों की ये विशिष्ट मृदाएँ हैं। इन मृदाओं का निर्माण आर्द्र एवं शुष्क ऋतुओं की बारम्बारता से होने वाले सिलिकामय पदार्थों के निक्षालन के परिणामस्वरूप हुआ है। इसमें लोहे के ऑक्साइड की उपस्थिति इसे लाल रंग प्रदान करती है। इन मृदाओं का विकास मुख्यतया पठार के उच्च भागों में हुआ है। निम्न भागों की तुलना में ये मृदाएँ उच्च भागों में अपेक्षाकृत अधिक अम्लीय हैं। लैटेराइट मृदाएँ भारत के लगभग 12.2 मिलियन हेक्टयर क्षेत्र में फैली हैं तथा ये भारत की समस्त मृदाओं की 3.7 प्रतिशत हैं। ये मृदाएँ मुख्यत: पश्चिमी घाट की पहाड़ियों , मालाबार तटीय क्षेत्र, पूर्वी घाट, राजमहल की पहाड़ियों , सतपुड़ा, विंध्य, ओडिशा, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, पं. बंगाल, असोम तथा मेघालय की गारो पहाड़ियों में पायी जाती हैं। इन मृदाओं में जहाँ लोहे, एल्युमिनियम की प्रचुरता होती है वही इनमें नाइट्रोजन, फॉस्फेट , चूने और जैविक पदार्थों की कमी पायी जाती है। हालांकि इनकी उर्वरता निम्न है। इनमें मुख्यत: चावल, कहवा, रागी, गन्ने और काजू की खेती होती है। अवातित अवस्था (anaerobic stage) में मृदा में अधिकतम जल/नमी (सम्पृक्तावस्था) परन्तु न्यूनतम वायु की दशा को मिट्टियों की अवातित अवस्था कहते हैं।