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Q: Which of the following epic mentions about tough sea journey of Katah island by Indian traders? निम्न में से कौन ग्रन्थ भारतीय व्यापारियों द्वारा कटाह द्वीप की कठिन समुद्री यात्रा का वर्णन करता है?
  • A. Perplus of the Erthrian sea/पेरिप्लस ऑफ द एरीथ्रियन सी
  • B. Samaraichchakaha/समराइच्चकहा
  • C. Baberu Jataka/बावेरु जातक
  • D. Milindpanho/मिलिन्दपन्हो
Correct Answer: Option B - अधिकांश जैन साहित्य धार्मिक प्रकृत्ति के है, जो प्राकृत्त (अर्द्ध-मागधी), संस्कृत व अपभ्रंश में लिखे गए हैं। प्राचीनतम जैन साहित्य 14 पूर्वों (पूब्बों) एवं 12 अंगों को चन्द्रगुप्त मौर्य के शासन काल में 300 ई. पूर्व में पाटलिपुत्र में आयोजित प्रथम जैन संगीति में संकलित किया गया। इसके अध्यक्ष स्थूलभद्र थे। द्वितीय जैन संगीति का आयोजन 512 ई. में मैत्रक वंशी शासक श्रवणसेन प्रथम के संरक्षण में वल्लभी में हुआ था। इस सभा की अध्यक्षता देवर्धिगण क्षमाश्रमण की अध्यक्षता में किया गया था। इस संगीति में आगम सिद्धान्त जिसमें 12 उपांग, 6 छित सूत्र, 4 मूल सूत्र छेद सूत्र, 10 प्रकीर्ण, 2 चूलिका सूत्र, नन्दी सूत्र एवं अनुयोग सूत्र आदि जैन ग्रन्थों को संकलित किया गया। जैन साहित्य में पुराणों का महत्व है, जिन्हें चरित्र भी कहा जाता है। ये प्राकृत, संस्कृत तथा अप्रभंश भाषा में लिखे गये हैं। इनमें से पद्मपुराण, हरिवंश पुराण (नौवीं शताब्दी में जिनसेन द्वार रचित ‘हरिवंश पुराण’ में कौरव, पाण्डव, कृष्ण, बलराम आदि की कथाओं को जैन संस्करण में लिखा गया है), महापुराण व कालिका पुराण प्रमुख है। भारतीय व्यापारियों द्वारा कटाह द्वीप की कठिन समुद्री यात्रा का वर्णन समराइच्चकहा नामक ग्रंथ में किया गया है। समराइच्चकहा की रचना हरिभद्र सूरि ने की थी।
B. अधिकांश जैन साहित्य धार्मिक प्रकृत्ति के है, जो प्राकृत्त (अर्द्ध-मागधी), संस्कृत व अपभ्रंश में लिखे गए हैं। प्राचीनतम जैन साहित्य 14 पूर्वों (पूब्बों) एवं 12 अंगों को चन्द्रगुप्त मौर्य के शासन काल में 300 ई. पूर्व में पाटलिपुत्र में आयोजित प्रथम जैन संगीति में संकलित किया गया। इसके अध्यक्ष स्थूलभद्र थे। द्वितीय जैन संगीति का आयोजन 512 ई. में मैत्रक वंशी शासक श्रवणसेन प्रथम के संरक्षण में वल्लभी में हुआ था। इस सभा की अध्यक्षता देवर्धिगण क्षमाश्रमण की अध्यक्षता में किया गया था। इस संगीति में आगम सिद्धान्त जिसमें 12 उपांग, 6 छित सूत्र, 4 मूल सूत्र छेद सूत्र, 10 प्रकीर्ण, 2 चूलिका सूत्र, नन्दी सूत्र एवं अनुयोग सूत्र आदि जैन ग्रन्थों को संकलित किया गया। जैन साहित्य में पुराणों का महत्व है, जिन्हें चरित्र भी कहा जाता है। ये प्राकृत, संस्कृत तथा अप्रभंश भाषा में लिखे गये हैं। इनमें से पद्मपुराण, हरिवंश पुराण (नौवीं शताब्दी में जिनसेन द्वार रचित ‘हरिवंश पुराण’ में कौरव, पाण्डव, कृष्ण, बलराम आदि की कथाओं को जैन संस्करण में लिखा गया है), महापुराण व कालिका पुराण प्रमुख है। भारतीय व्यापारियों द्वारा कटाह द्वीप की कठिन समुद्री यात्रा का वर्णन समराइच्चकहा नामक ग्रंथ में किया गया है। समराइच्चकहा की रचना हरिभद्र सूरि ने की थी।

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अधिकांश जैन साहित्य धार्मिक प्रकृत्ति के है, जो प्राकृत्त (अर्द्ध-मागधी), संस्कृत व अपभ्रंश में लिखे गए हैं। प्राचीनतम जैन साहित्य 14 पूर्वों (पूब्बों) एवं 12 अंगों को चन्द्रगुप्त मौर्य के शासन काल में 300 ई. पूर्व में पाटलिपुत्र में आयोजित प्रथम जैन संगीति में संकलित किया गया। इसके अध्यक्ष स्थूलभद्र थे। द्वितीय जैन संगीति का आयोजन 512 ई. में मैत्रक वंशी शासक श्रवणसेन प्रथम के संरक्षण में वल्लभी में हुआ था। इस सभा की अध्यक्षता देवर्धिगण क्षमाश्रमण की अध्यक्षता में किया गया था। इस संगीति में आगम सिद्धान्त जिसमें 12 उपांग, 6 छित सूत्र, 4 मूल सूत्र छेद सूत्र, 10 प्रकीर्ण, 2 चूलिका सूत्र, नन्दी सूत्र एवं अनुयोग सूत्र आदि जैन ग्रन्थों को संकलित किया गया। जैन साहित्य में पुराणों का महत्व है, जिन्हें चरित्र भी कहा जाता है। ये प्राकृत, संस्कृत तथा अप्रभंश भाषा में लिखे गये हैं। इनमें से पद्मपुराण, हरिवंश पुराण (नौवीं शताब्दी में जिनसेन द्वार रचित ‘हरिवंश पुराण’ में कौरव, पाण्डव, कृष्ण, बलराम आदि की कथाओं को जैन संस्करण में लिखा गया है), महापुराण व कालिका पुराण प्रमुख है। भारतीय व्यापारियों द्वारा कटाह द्वीप की कठिन समुद्री यात्रा का वर्णन समराइच्चकहा नामक ग्रंथ में किया गया है। समराइच्चकहा की रचना हरिभद्र सूरि ने की थी।