Correct Answer:
Option D - ‘हितं मनोहारि च दुर्लभं वच:’यह सूक्ति महाकवि भारवि प्रणीतम् किरातार्जुनीयम् महाकाव्य के प्रथम सर्ग की है। इसमें वनेचर महाराज युधिष्ठिर से द्वैतवन में आकर कहता है कि हितकर एवं मनोहर वचन दुर्लभ होते हैं।
D. ‘हितं मनोहारि च दुर्लभं वच:’यह सूक्ति महाकवि भारवि प्रणीतम् किरातार्जुनीयम् महाकाव्य के प्रथम सर्ग की है। इसमें वनेचर महाराज युधिष्ठिर से द्वैतवन में आकर कहता है कि हितकर एवं मनोहर वचन दुर्लभ होते हैं।