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Q: विश्वस्य उपलब्धासु भाषासु संस्कृतभाषा प्राचीनतमा भाषास्ति। भाषेयम् अनेकानां भाषाणां जननी मता। प्राचीनयो: ज्ञान-विज्ञानयो: निधि: अस्यां सुरक्षित:। संस्कृतस्य महत्त्वविषये केनापि कथितम् -‘‘भारतस्य प्रतिष्ठे द्वे संस्कृतं संस्कृतिस्तथा’’। इयं भाषा अतीव वैज्ञानिकी। केचन कथयन्ति यत् संस्कृतमेव सङ्गणकस्यकृते सर्वोत्तमा भाषा। अस्या: वाङ्मयं वेदै: पुराणै: नीतिशास्त्रे: चिकित्साशास्त्रादिभिश्च समृद्धमस्ति। कालिदासादीनां विश्वकवीनां काव्यसौन्दर्यम् अनुपमम्। कौटिल्यरचितम् अर्थशास्त्रं जगति प्रसिद्धमस्ति। गणितशास्त्रे शून्यस्य प्रतिपादनं सर्वप्रथमम् आर्यभट: अकरोत्। चिकित्साशास्त्रे चरकसुश्रुतयो: योगदानं विश्वप्रसिद्धम्। संस्कृते यानि अन्यानि शास्त्राणि विद्यन्ते तेषु वास्तुशास्त्रं, रसायनशास्त्रं खगोलविज्ञानं, ज्योतिषशास्त्रं, विमानशास्त्रम् इत्यादीनि उल्लेखनीयानि। संस्कृते विद्यमाना: सूक्तय: अभ्युदयाय प्रेरयन्ति। यथा- सत्यमेव जयते, वसुधैव कुटुम्बकम्, विद्ययाऽमृतमश्नुते, योग: कर्मसु कौशलम् इत्यादय:। सर्वभूतेषु आत्मवत् व्यवहारं कर्तुं संस्कृतभाषा सम्यक् शिक्षयति। 6. सर्वभूतेषू आत्मवत् व्यवहारं कर्तुं संस्कृतभाषा शिक्षयति चेत् तेन किं प्राप्यते?
  • A. भाषाज्ञानम्
  • B. समानता
  • C. आत्मज्ञानम्
  • D. व्यवहारज्ञानम्
Correct Answer: Option B - सर्वभूतेषु आत्मवत् व्यवहारं कर्तुं संस्कृतभाषा शिक्षयति चेत् तेन समानता प्राप्यते। उपर्युक्त गद्यांश में बताया गया है कि- सभी प्राणियों से आत्मवत् व्यवहार करना चाहिए यही हमारी संस्कृत भाषा बताती है क्योंकि संस्कृत भाषा का मूल मंत्र है- ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ पृथ्वी पर रहने वाले सभी लोग अपने परिवार के ही समान होते हैं। इसीलिए उनसे आत्मवत् व्यवहार करना चाहिए।
B. सर्वभूतेषु आत्मवत् व्यवहारं कर्तुं संस्कृतभाषा शिक्षयति चेत् तेन समानता प्राप्यते। उपर्युक्त गद्यांश में बताया गया है कि- सभी प्राणियों से आत्मवत् व्यवहार करना चाहिए यही हमारी संस्कृत भाषा बताती है क्योंकि संस्कृत भाषा का मूल मंत्र है- ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ पृथ्वी पर रहने वाले सभी लोग अपने परिवार के ही समान होते हैं। इसीलिए उनसे आत्मवत् व्यवहार करना चाहिए।

Explanations:

सर्वभूतेषु आत्मवत् व्यवहारं कर्तुं संस्कृतभाषा शिक्षयति चेत् तेन समानता प्राप्यते। उपर्युक्त गद्यांश में बताया गया है कि- सभी प्राणियों से आत्मवत् व्यवहार करना चाहिए यही हमारी संस्कृत भाषा बताती है क्योंकि संस्कृत भाषा का मूल मंत्र है- ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ पृथ्वी पर रहने वाले सभी लोग अपने परिवार के ही समान होते हैं। इसीलिए उनसे आत्मवत् व्यवहार करना चाहिए।