Q: निर्देश : निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों (प्र.सं 112 से 120) में सही। सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए। अपने स्वार्थ या संस्कृति के कारण सामान्य व्यवहार में हम कितनी ही बार सबसे धन्यवाद बोलते हैं। तो यह कृतज्ञता सिर्फ उन्हीं तक सीमित क्यों? हमें मानव जन्म देने वाले ईश्वर के लिए और जलवायु, भोजन, ऊर्जा जैसे बहुत सारे उपहार देने वाली प्रकृति के लिए भी क्यों नहीं? हम ईश्वर से संवाद करें कि वह हमारे हृदय में पवित्रता, सद्गुणों के प्रकाश को आलोकित करें। दुखों के कारण तो हमारे विकार हैं, बुराइयाँ है। हर बुराई अज्ञान के अंधकार में फैलती है, प्रकाश होते ही उसका सामर्थ्य खत्म हो जाता है। सुख-दुख दोनों ही हमारे कर्मों के फल हैं। हमें समझना चाहिए कि बिना दुख भोगे, सुख नहीं पाया जा सकता है। मानवीय पुरुषार्थ करते रहें, मन की कोठरी को स्वच्छ रखें, जहाँ जरूरत हो, प्रायश्चित भी अवश्य करेें। कौन जाने कब किस रूप मे प्रभु किस माध्यम से सहायक हो जाएँ। ईश्वर के प्रति आभार प्रकट करना एक ऐसा अचूक तरीका है जो हमें असंतुष्टि और ईर्ष्या जैसी निकृष्ट बातों से ऊपर उठाता है और यही हमारे जीवन का मूलभूत लक्ष्य है। ‘मन की कोठरी को स्वच्छ रखें’, से तात्पर्य है:
A.
मन के अनुसार कार्य करना।
B.
मन सब विकारों का कारण है।
C.
मन को नियंत्रण मे रखना।
D.
मन से बुरे भावों का निष्कासन।
Correct Answer:
Option D - गद्यांश के अनुसार ‘मन की कोठरी को स्वच्छ रखें’ से तात्पर्य है मन से बुरे भावों का निष्कासन। क्योकि दुखों का कारण हमारे अन्दर की बुराइयॉ हैं। यह बुराई अज्ञान के अन्धकार में फैलता है।
D. गद्यांश के अनुसार ‘मन की कोठरी को स्वच्छ रखें’ से तात्पर्य है मन से बुरे भावों का निष्कासन। क्योकि दुखों का कारण हमारे अन्दर की बुराइयॉ हैं। यह बुराई अज्ञान के अन्धकार में फैलता है।
Explanations:
गद्यांश के अनुसार ‘मन की कोठरी को स्वच्छ रखें’ से तात्पर्य है मन से बुरे भावों का निष्कासन। क्योकि दुखों का कारण हमारे अन्दर की बुराइयॉ हैं। यह बुराई अज्ञान के अन्धकार में फैलता है।
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