search
Q: ‘वनेचर:’ इत्यत्र क: समास:?
  • A. अव्ययीभाव:
  • B. अलुक्
  • C. तत्पुरुष:
  • D. कर्मधारय:
Correct Answer: Option B - : ‘वनेचर:’ इत्यत्र अलुक् समास: वनेचर में अलुक् समास है। अलुक् समास- जिन स्थानों पर बीच की विभक्ति का लोप नहीं होता है, उसे अलुक् समास कहते हैं। विभक्ति लोप इन स्थानों पर नहीं होता है। जैसे- परस्मैपदम्, युधिष्ठिर:, शुन:शेप: आदि। अव्ययीभाव- पूर्व पद अव्यय दूसरा पद संज्ञा होगा (उपकृष्णम्) तत्पुरुष- जहाँ पर दो या अधिक शब्दों के बीच में से द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, पञ्चमी, षष्ठी या सप्तमी विभक्ति का लोप होता है। जिस विभक्ति का लोप होगा उसी के नाम से वह तत्पुरुष समास कहा जायेगा। यथा- (शोकगत:, नखभिन्न:)। कर्मधारय- तत्पुरुष समास के दोनों पदों में जब एक ही विभक्ति रहती है, तब उसे कर्मधारय समास कहते हैं। (नीलोत्पलम्, कृष्णसर्प:)
B. : ‘वनेचर:’ इत्यत्र अलुक् समास: वनेचर में अलुक् समास है। अलुक् समास- जिन स्थानों पर बीच की विभक्ति का लोप नहीं होता है, उसे अलुक् समास कहते हैं। विभक्ति लोप इन स्थानों पर नहीं होता है। जैसे- परस्मैपदम्, युधिष्ठिर:, शुन:शेप: आदि। अव्ययीभाव- पूर्व पद अव्यय दूसरा पद संज्ञा होगा (उपकृष्णम्) तत्पुरुष- जहाँ पर दो या अधिक शब्दों के बीच में से द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, पञ्चमी, षष्ठी या सप्तमी विभक्ति का लोप होता है। जिस विभक्ति का लोप होगा उसी के नाम से वह तत्पुरुष समास कहा जायेगा। यथा- (शोकगत:, नखभिन्न:)। कर्मधारय- तत्पुरुष समास के दोनों पदों में जब एक ही विभक्ति रहती है, तब उसे कर्मधारय समास कहते हैं। (नीलोत्पलम्, कृष्णसर्प:)

Explanations:

: ‘वनेचर:’ इत्यत्र अलुक् समास: वनेचर में अलुक् समास है। अलुक् समास- जिन स्थानों पर बीच की विभक्ति का लोप नहीं होता है, उसे अलुक् समास कहते हैं। विभक्ति लोप इन स्थानों पर नहीं होता है। जैसे- परस्मैपदम्, युधिष्ठिर:, शुन:शेप: आदि। अव्ययीभाव- पूर्व पद अव्यय दूसरा पद संज्ञा होगा (उपकृष्णम्) तत्पुरुष- जहाँ पर दो या अधिक शब्दों के बीच में से द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, पञ्चमी, षष्ठी या सप्तमी विभक्ति का लोप होता है। जिस विभक्ति का लोप होगा उसी के नाम से वह तत्पुरुष समास कहा जायेगा। यथा- (शोकगत:, नखभिन्न:)। कर्मधारय- तत्पुरुष समास के दोनों पदों में जब एक ही विभक्ति रहती है, तब उसे कर्मधारय समास कहते हैं। (नीलोत्पलम्, कृष्णसर्प:)