Correct Answer:
Option A - ध्वनिपरिवर्तनस्य आभ्यन्तरकारणं ‘लिपिदोष:’ नास्ति।
अर्थात् ध्वनिपरिवर्तन का आभ्यन्तरकारण ‘लिपिदोष’ नहीं है। यह परिवर्तन सृष्टि का नियम है विश्व की प्रत्येक वस्तु में निरन्तर परिवर्तन होता रहता है, अत: भाषा का प्रमुख तत्व है, इससे वक्ता पर दो प्रकार का प्रभाव पड़ने से ध्वनि के आभ्यन्तर और बाह्य दो प्रकार के कारण हैं। श्रोता और वक्ता से सम्बद्ध कारणों को आभ्यन्तर कारण कहते हैं। जैसे-प्रयत्नलाघव या मुखसुख, अशिक्षा, शीघ्रभाषण, भावावेश, काव्यात्मकता, बलाघात, कृत्रिमता भ्रामक व्युत्पत्ति लघुकरण की प्रवृत्ति इत्यादि तथा इनके अतिरिक्त कारणों को बाह्य कारण कहते हैं, जैसे- सामाजिक, राजनीतिक, भौगोलिक लिपि दोष, सादृश्यता आदि। अत: प्रश्नानुसार विकल्प (a) सही है। अन्य शेष विकल्प सही नहीं है।
A. ध्वनिपरिवर्तनस्य आभ्यन्तरकारणं ‘लिपिदोष:’ नास्ति।
अर्थात् ध्वनिपरिवर्तन का आभ्यन्तरकारण ‘लिपिदोष’ नहीं है। यह परिवर्तन सृष्टि का नियम है विश्व की प्रत्येक वस्तु में निरन्तर परिवर्तन होता रहता है, अत: भाषा का प्रमुख तत्व है, इससे वक्ता पर दो प्रकार का प्रभाव पड़ने से ध्वनि के आभ्यन्तर और बाह्य दो प्रकार के कारण हैं। श्रोता और वक्ता से सम्बद्ध कारणों को आभ्यन्तर कारण कहते हैं। जैसे-प्रयत्नलाघव या मुखसुख, अशिक्षा, शीघ्रभाषण, भावावेश, काव्यात्मकता, बलाघात, कृत्रिमता भ्रामक व्युत्पत्ति लघुकरण की प्रवृत्ति इत्यादि तथा इनके अतिरिक्त कारणों को बाह्य कारण कहते हैं, जैसे- सामाजिक, राजनीतिक, भौगोलिक लिपि दोष, सादृश्यता आदि। अत: प्रश्नानुसार विकल्प (a) सही है। अन्य शेष विकल्प सही नहीं है।