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Q: ‘शरीरभाजां भवदीयदर्शनं व्यनक्ति कालत्रितयेऽपि योग्यताम्’ इतीदं वचनमस्ति
  • A. शिशुपालवधे श्रीकृष्णस्य नारदं प्रति
  • B. शिशुपालवधे नारदस्य श्रीकृष्णं प्रति
  • C. अभिज्ञानशाकुन्तले अनसूयाया: दुर्वाससं प्रति
  • D. कुमारसंभवे पार्वत्य: महादेवं प्रति
Correct Answer: Option A - ‘शरीरभाजां भवदीयदर्शनं व्यनक्ति कालत्रितयेऽपि योग्यताम्’ इतीदं शिशुपालवधे श्रीकृष्णस्य नारदं प्रति वचनमस्ति। शरीरभाजां भवदीयदर्शनं व्यनक्ति कालत्रितयेऽपि योग्यताम् प्रस्तुत सूक्तिपरक वाक्य महाकवि माघ विरचित ‘शिशुपालवधम्’ के प्रथम सर्ग में श्री कृष्ण ने नारद के प्रति कहा है कि आपका दर्शन देहधारियों के लिए भूत-भविष्य और वर्तमान इन तीनों कालों में योग्यता को व्यक्त करता है।
A. ‘शरीरभाजां भवदीयदर्शनं व्यनक्ति कालत्रितयेऽपि योग्यताम्’ इतीदं शिशुपालवधे श्रीकृष्णस्य नारदं प्रति वचनमस्ति। शरीरभाजां भवदीयदर्शनं व्यनक्ति कालत्रितयेऽपि योग्यताम् प्रस्तुत सूक्तिपरक वाक्य महाकवि माघ विरचित ‘शिशुपालवधम्’ के प्रथम सर्ग में श्री कृष्ण ने नारद के प्रति कहा है कि आपका दर्शन देहधारियों के लिए भूत-भविष्य और वर्तमान इन तीनों कालों में योग्यता को व्यक्त करता है।

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‘शरीरभाजां भवदीयदर्शनं व्यनक्ति कालत्रितयेऽपि योग्यताम्’ इतीदं शिशुपालवधे श्रीकृष्णस्य नारदं प्रति वचनमस्ति। शरीरभाजां भवदीयदर्शनं व्यनक्ति कालत्रितयेऽपि योग्यताम् प्रस्तुत सूक्तिपरक वाक्य महाकवि माघ विरचित ‘शिशुपालवधम्’ के प्रथम सर्ग में श्री कृष्ण ने नारद के प्रति कहा है कि आपका दर्शन देहधारियों के लिए भूत-भविष्य और वर्तमान इन तीनों कालों में योग्यता को व्यक्त करता है।