Correct Answer:
Option C - श्रीमद्भगवद्गीताया: ‘सप्तमे’ अध्याये भगवान् स्वकीयाम् अष्टधां प्रकृतिं प्रोक्तवान्।
श्रीमदभगवदगीता के सातवें अध्याय में भगवान् (श्रीकृष्ण) अपनी आठ प्रकार की प्रकृति को कहा- जो ये आठ प्रकृतियाँ - पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार है।
भूमिरापोऽनलो वायु खं मनो बुद्धिरेव च।
अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा।।4।।
कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा रचित श्रीमदभगवदगीता में अट्ठारह अध्याय और सात सौ (700) श्लोक हैं इसमें छठे अध्याय का नाम ‘आत्मसंयमयोग’ और चौथे, पाँचवे अध्याय का नाम क्रमश: ‘ज्ञान कर्मसंन्यासयोग’ ‘कर्मसंन्यासयोग’ है।
C. श्रीमद्भगवद्गीताया: ‘सप्तमे’ अध्याये भगवान् स्वकीयाम् अष्टधां प्रकृतिं प्रोक्तवान्।
श्रीमदभगवदगीता के सातवें अध्याय में भगवान् (श्रीकृष्ण) अपनी आठ प्रकार की प्रकृति को कहा- जो ये आठ प्रकृतियाँ - पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार है।
भूमिरापोऽनलो वायु खं मनो बुद्धिरेव च।
अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा।।4।।
कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा रचित श्रीमदभगवदगीता में अट्ठारह अध्याय और सात सौ (700) श्लोक हैं इसमें छठे अध्याय का नाम ‘आत्मसंयमयोग’ और चौथे, पाँचवे अध्याय का नाम क्रमश: ‘ज्ञान कर्मसंन्यासयोग’ ‘कर्मसंन्यासयोग’ है।