Correct Answer:
Option A - शुष्क मृदा मध्य प्रदेश में नहीं मिलती है। मध्य प्रदेश में मृदा 5 प्रकार की पायी जाती है जो इस प्रकार है-
(1) काली मृदा– इसे रेगुर मृदा भी कहते हैं, यह मालवा के पठार, नर्मदा घाटी, विंध्याचल के आस-पास के जिलों में पायी जाती है।
(2) जलोढ मृदा– इसे दोमट मृदा भी कहा जाता है। इस मृदा का निर्माण चम्बल एवं उसकी सहायक नदियों द्वारा बहाकर लाये गये कछारों में भिंड, मुरैना, श्योपुर, ग्वालियर जिलों में पाई जाती है।
(3) लाल-पीली मृदा– इस मृदा का निर्माण रवेदार और रूपांतरित चट्टानों के अपरदन से होता है। यह मुख्यत: बुंदेलखण्ड और बघेलखण्ड में पायी जाती है।
(4) लैटेराइट मृदा-यह एक चट्टानी मृदा है। इसमें चट्टानों के कण अधिक पाये जाते हैं। यह मृदा बागवानी फसलों के लिए उपयुक्त मानी जाती है। यह मृदा छिंदवाड़ा और बालाघाट जिलों में पाई जाती है।
(5) मिश्रित लाल एवं काली मृदा- इस मृदा को लाल रेतीली मृदा के नाम से जाना जाता है। यह मृदा नीस व ग्रेनाइट चट्टानों के विखण्डन से निर्मित होती है। यह मृदा बुंदेलखण्ड के कुछ भागों में पायी जाती है।
A. शुष्क मृदा मध्य प्रदेश में नहीं मिलती है। मध्य प्रदेश में मृदा 5 प्रकार की पायी जाती है जो इस प्रकार है-
(1) काली मृदा– इसे रेगुर मृदा भी कहते हैं, यह मालवा के पठार, नर्मदा घाटी, विंध्याचल के आस-पास के जिलों में पायी जाती है।
(2) जलोढ मृदा– इसे दोमट मृदा भी कहा जाता है। इस मृदा का निर्माण चम्बल एवं उसकी सहायक नदियों द्वारा बहाकर लाये गये कछारों में भिंड, मुरैना, श्योपुर, ग्वालियर जिलों में पाई जाती है।
(3) लाल-पीली मृदा– इस मृदा का निर्माण रवेदार और रूपांतरित चट्टानों के अपरदन से होता है। यह मुख्यत: बुंदेलखण्ड और बघेलखण्ड में पायी जाती है।
(4) लैटेराइट मृदा-यह एक चट्टानी मृदा है। इसमें चट्टानों के कण अधिक पाये जाते हैं। यह मृदा बागवानी फसलों के लिए उपयुक्त मानी जाती है। यह मृदा छिंदवाड़ा और बालाघाट जिलों में पाई जाती है।
(5) मिश्रित लाल एवं काली मृदा- इस मृदा को लाल रेतीली मृदा के नाम से जाना जाता है। यह मृदा नीस व ग्रेनाइट चट्टानों के विखण्डन से निर्मित होती है। यह मृदा बुंदेलखण्ड के कुछ भागों में पायी जाती है।