Explanations:
सुयोधन: जगतीं नयेन जेतुं समीहते। यह किरातार्जुनीयम् के प्रथम अंक की सूक्ति है। दुर्योधन के कपटयुक्त स्वभाव में आये बदलाव के विषय में बताते हुए वनचेर युधिष्ठिर से कह रहा है कि दुर्योधन (सुयोधन) ‘पृथ्वी को नीति से जीतने का प्रयत्न कर रहा है।’ उसने आपके जिस राज्य को छल (छद्म) पूर्वक हड़प लिया था उसे अब नीतिमार्ग से भी जीतना चाहता है।