Correct Answer:
Option D - सभी विकल्प स्थित प्रज्ञ के लक्षण हैं। गीता अध्याय दो श्लोक 55, 56 में कहा गया है-
प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान्।
आत्मन्येवात्मना तुष्ट: स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते।।55
दुखेष्वनुद्विग्नमना: सुखेषु विगतस्पृह:।
वीतरागभयक्रोध: स्थितधीर्मुनिरुच्यते।।56
अर्थात् जिसकाल में (यह पुरुष) मन में स्थित सम्पूर्ण कामनाओं को भलीभाँति त्याग देता है और आत्मा से आत्मा अर्थात् अपने आपसे अपने आप में ही संतुष्ट रहता है, उस काल में (वह) स्थित प्रज्ञ कहा जाता है तथा दु:खों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में उद्वेग नहीं होता, सुखों की प्राप्ति में जो सर्वथा नि:स्पृह है तथा जिसके राग, भय और क्रोध नष्ट हो गये हैं (ऐसा) मुनि स्थिर बुद्धि कहा जाता है।
D. सभी विकल्प स्थित प्रज्ञ के लक्षण हैं। गीता अध्याय दो श्लोक 55, 56 में कहा गया है-
प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान्।
आत्मन्येवात्मना तुष्ट: स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते।।55
दुखेष्वनुद्विग्नमना: सुखेषु विगतस्पृह:।
वीतरागभयक्रोध: स्थितधीर्मुनिरुच्यते।।56
अर्थात् जिसकाल में (यह पुरुष) मन में स्थित सम्पूर्ण कामनाओं को भलीभाँति त्याग देता है और आत्मा से आत्मा अर्थात् अपने आपसे अपने आप में ही संतुष्ट रहता है, उस काल में (वह) स्थित प्रज्ञ कहा जाता है तथा दु:खों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में उद्वेग नहीं होता, सुखों की प्राप्ति में जो सर्वथा नि:स्पृह है तथा जिसके राग, भय और क्रोध नष्ट हो गये हैं (ऐसा) मुनि स्थिर बुद्धि कहा जाता है।