search
Q: सांख्यदर्शनानुसारं ‘करणं’ कतिविधम्?
  • A. अष्टविधम् (08)
  • B. दशविधम् (10)
  • C. त्रयोदशविधम् (13)
  • D. षोडशविधम् (16)
Correct Answer: Option C - सांख्यदर्शनानुसारं ‘करणं’ त्रयोदशविधम्। अर्थात् सांख्यदर्शन के अनुसार करण तेरह (13) प्रकार के होते हैं-दशेन्द्रिय मन, बुद्धि, अहंकार। जिसमें पञ्चकर्मेन्द्रियाँ वाक्-पाणि-पाद-पायु-उपस्थ ये अपने विषयों को आहरित तथा मन, बुद्धि अहंकार विषयों को धारण तथा ज्ञानेन्द्रियाँ विषयों को प्रकाशित (करने का कार्य) करती हैं। ये आहरित, धारण और प्रकाशित किये गये (करणों के) कार्य दस-दस प्रकार के होते हैं। अत: विकल्प (c) सही है, शेष अन्य विकल्प निम्न प्रकार हैं- (a) अष्टविधम् - प्रकृति (मूल प्रकृति), बुद्धि (महत्), अहंकार और पाँच तन्मात्रा ये आठ कारण (प्रकृति) किसी के कारण हैं। (सप्त विकृति प्रकृतय:) (b) दशविधम् - पाँच कर्मेन्द्रियाँ और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ ये दस की संख्या में बाह्येन्द्रियाँ तथा मन को उभयेन्द्रिय कहकर कुल एकादशेन्द्रियाँ होती हैं। (d) षोडशविधम् - ‘विकारस्तु षोडशकम्’ अर्थात् सोलह संख्याओं का विकार (कार्य) ही विकृति कहलाता है।
C. सांख्यदर्शनानुसारं ‘करणं’ त्रयोदशविधम्। अर्थात् सांख्यदर्शन के अनुसार करण तेरह (13) प्रकार के होते हैं-दशेन्द्रिय मन, बुद्धि, अहंकार। जिसमें पञ्चकर्मेन्द्रियाँ वाक्-पाणि-पाद-पायु-उपस्थ ये अपने विषयों को आहरित तथा मन, बुद्धि अहंकार विषयों को धारण तथा ज्ञानेन्द्रियाँ विषयों को प्रकाशित (करने का कार्य) करती हैं। ये आहरित, धारण और प्रकाशित किये गये (करणों के) कार्य दस-दस प्रकार के होते हैं। अत: विकल्प (c) सही है, शेष अन्य विकल्प निम्न प्रकार हैं- (a) अष्टविधम् - प्रकृति (मूल प्रकृति), बुद्धि (महत्), अहंकार और पाँच तन्मात्रा ये आठ कारण (प्रकृति) किसी के कारण हैं। (सप्त विकृति प्रकृतय:) (b) दशविधम् - पाँच कर्मेन्द्रियाँ और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ ये दस की संख्या में बाह्येन्द्रियाँ तथा मन को उभयेन्द्रिय कहकर कुल एकादशेन्द्रियाँ होती हैं। (d) षोडशविधम् - ‘विकारस्तु षोडशकम्’ अर्थात् सोलह संख्याओं का विकार (कार्य) ही विकृति कहलाता है।

Explanations:

सांख्यदर्शनानुसारं ‘करणं’ त्रयोदशविधम्। अर्थात् सांख्यदर्शन के अनुसार करण तेरह (13) प्रकार के होते हैं-दशेन्द्रिय मन, बुद्धि, अहंकार। जिसमें पञ्चकर्मेन्द्रियाँ वाक्-पाणि-पाद-पायु-उपस्थ ये अपने विषयों को आहरित तथा मन, बुद्धि अहंकार विषयों को धारण तथा ज्ञानेन्द्रियाँ विषयों को प्रकाशित (करने का कार्य) करती हैं। ये आहरित, धारण और प्रकाशित किये गये (करणों के) कार्य दस-दस प्रकार के होते हैं। अत: विकल्प (c) सही है, शेष अन्य विकल्प निम्न प्रकार हैं- (a) अष्टविधम् - प्रकृति (मूल प्रकृति), बुद्धि (महत्), अहंकार और पाँच तन्मात्रा ये आठ कारण (प्रकृति) किसी के कारण हैं। (सप्त विकृति प्रकृतय:) (b) दशविधम् - पाँच कर्मेन्द्रियाँ और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ ये दस की संख्या में बाह्येन्द्रियाँ तथा मन को उभयेन्द्रिय कहकर कुल एकादशेन्द्रियाँ होती हैं। (d) षोडशविधम् - ‘विकारस्तु षोडशकम्’ अर्थात् सोलह संख्याओं का विकार (कार्य) ही विकृति कहलाता है।