Correct Answer:
Option A - ‘रजोजुषे जन्मनि सत्त्ववृत्तये’ - अस्मिन् श्लोकांशे ‘रजोजुषे’ इति पदे चतुर्थी विभक्ति: अस्ति।
अर्थात् इस श्लोकांश में ‘रजोजुषे’ इस पद में चतुर्थी विभक्ति है, यह श्लोकांश बाण द्वारा विरचित ‘कादम्बरी’ के मङ्गलाचरण से अवतरित है इसमें त्रिगुणात्मक रजोगुण सम्पन्न ब्रह्म सत्त्वगुण सम्पन्न-विष्णु, तमोगुण सम्पन्न-शंकर (सर्गस्थितिनाश हेतवे) को नमस्कार किया गया है अत: विकल्प (a) सही है। नम: के योग में ‘नम: स्वस्तिस्वाहास्वधाऽलंवषड्योगाच्च’ सूत्र से रजोजुषे, सत्ववृत्तये तथा तम:स्पृशे में चतुर्थी विभक्ति हुई है।
नोट - वंशस्थ छन्द का लक्षण- जतौ तु वंशस्थमुदीरितं जरौ।
A. ‘रजोजुषे जन्मनि सत्त्ववृत्तये’ - अस्मिन् श्लोकांशे ‘रजोजुषे’ इति पदे चतुर्थी विभक्ति: अस्ति।
अर्थात् इस श्लोकांश में ‘रजोजुषे’ इस पद में चतुर्थी विभक्ति है, यह श्लोकांश बाण द्वारा विरचित ‘कादम्बरी’ के मङ्गलाचरण से अवतरित है इसमें त्रिगुणात्मक रजोगुण सम्पन्न ब्रह्म सत्त्वगुण सम्पन्न-विष्णु, तमोगुण सम्पन्न-शंकर (सर्गस्थितिनाश हेतवे) को नमस्कार किया गया है अत: विकल्प (a) सही है। नम: के योग में ‘नम: स्वस्तिस्वाहास्वधाऽलंवषड्योगाच्च’ सूत्र से रजोजुषे, सत्ववृत्तये तथा तम:स्पृशे में चतुर्थी विभक्ति हुई है।
नोट - वंशस्थ छन्द का लक्षण- जतौ तु वंशस्थमुदीरितं जरौ।