Correct Answer:
Option C - लवणोंद्भिद पौधों में जडें दो प्रकार की होेती है। वायवीय (aerial) तथा भूमिगत (Subterranean)। वायवीय जड़े दलदल से बाहर सीधी निकल जाती हैं और खूँटों जैसी रचनाओं के रूप में दिखायी देती हैं ये जड़े ऋणात्मक गुरुत्वाकर्षी (negatively geotropic) होती हैं इन पर अनेक छिद्र होते हैं। ये जड़े श्वसन का कार्य करती हैं, इन्हें श्वसन मूल (Pneumatophores) कहते हैं, जैसे सोनेरेशिया (Sonneratia) तथा एवीसीनिया (Avicennia) आदि श्वसन मूलों द्वारा ग्रहण की गयी आक्सीजन न केवल जल निमग्न जड़ों के काम आती है, बल्कि इसे उस रूके लवणीय जल में रहने वाले जन्तु भी प्रयुक्त करते हैं।
C. लवणोंद्भिद पौधों में जडें दो प्रकार की होेती है। वायवीय (aerial) तथा भूमिगत (Subterranean)। वायवीय जड़े दलदल से बाहर सीधी निकल जाती हैं और खूँटों जैसी रचनाओं के रूप में दिखायी देती हैं ये जड़े ऋणात्मक गुरुत्वाकर्षी (negatively geotropic) होती हैं इन पर अनेक छिद्र होते हैं। ये जड़े श्वसन का कार्य करती हैं, इन्हें श्वसन मूल (Pneumatophores) कहते हैं, जैसे सोनेरेशिया (Sonneratia) तथा एवीसीनिया (Avicennia) आदि श्वसन मूलों द्वारा ग्रहण की गयी आक्सीजन न केवल जल निमग्न जड़ों के काम आती है, बल्कि इसे उस रूके लवणीय जल में रहने वाले जन्तु भी प्रयुक्त करते हैं।