Explanations:
‘पृथुकार्तस्वरपात्रं भूषितनि:शेषपरिजनं देव। विलसत्करेणुगहनं सम्प्रति सममावयो: सदनम्।। इतिश्लोके श्लेष: अलज्ररोऽस्ति।’ अर्थात् इस श्लोक में श्लेष, अलज्रर है। यहाँ ‘पृथुकार्तस्वरपात्रं’ भूषितनि:शेष परिजनं तथा विलसत्करेणुगहनं ये तीनों पद श्लिष्ट है इनके राजा और भिखारी के पक्ष में दो-दो अर्थ निकलते हैं जैसे-पृथु कार्तस्वरपात्रं और पृथक् - आर्तस्वरपात्रं (राजा का घर स्वर्णिम पात्रों से युक्त तथा भिखारी का घर बच्चों के रोने से युक्त)। लक्षण- वाच्यभेदेन भिन्ना यद् युगपद्भाषणस्पृश:। श्लिष्यन्ति शब्दा: श्लेषोऽसावक्षरादिभिरष्टधा।। यह- (1) वर्णश्लेष, (2) पदश्लेष, (3) लिङ्गश्लेष (4) भाषाश्लेष (5) प्रकृति श्लेष (6) प्रत्यय श्लेष (7) विभक्ति श्लेष और 8 वचन श्लेष के भेद से आठ प्रकार का होता है। अत: विकल्प (b) सही है शेष विकल्पों का लक्षण- (a) यमक- अर्थे सत्यर्थभिन्नानां वर्णानां सा पुन: श्रुति। (c) वक्रोक्ति - यदुक्तमन्यथावाक्यमन्यथाऽन्येन योज्यते। श्लेषेण काक्वा वा ज्ञेया सा वक्रोक्तिस्तथा द्विधा।। (d) स्वभावोक्ति - स्वभावोक्तिस्तु डिम्भादे: स्वक्रियारूपवर्णनम्।।