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Q: प्रयोगवाद के प्रवर्तक के अनुसार प्रयोगवादी कवि का मुख्य तथ्य क्या था?
  • A. भावुकता के स्थान पर बौद्धिकता को प्रतिष्ठा
  • B. नई राहों का अन्वेषण
  • C. नए काव्य-उपकरणों का प्रयोग
  • D. उपर्युक्त में से एक से अधिक
  • E. उपर्युक्त में से कोई नहीं
Correct Answer: Option D - प्रयोगवाद के प्रवर्तक के अनुसार प्रयोगवादी कवि का मुख्य तथ्य दिये गये विकल्पों में एक से अधिक विकल्प सही है। • हिन्दी में प्रयोगवाद का प्रारम्भ सन् 1943 में अज्ञेय के संपादन में प्रकाशित ‘तारसप्तक’ से माना जाता है। इसकी भूमिका में अज्ञेय ने लिखा है कि प्रयोगवादी कवि नवीन राहों के अन्वेषी हैं। स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात अज्ञेय के सम्पादन में ‘प्रतीक’ पत्रिका का संपादन हुआ, जिसमें प्रयोगवाद का स्वरूप स्पष्ट हुआ। प्रयोगवाद की विशेषताएँ:- 1. नवीन उपमानों का प्रयोग 2. वैयक्तिकता की प्रधानता 3. प्रेम भावनाओं का खुला चित्रण 4. बुद्धिवाद की प्रधानता 5. वैचित्र्य प्रदर्शन की भावना 6. लघुमानव वाद की प्रतिष्ठा 7. मुक्त छन्दों का प्रयोग 8. रूढि़यों के प्रति विद्रोह 9. अहं की प्रधानता इत्यादि है।
D. प्रयोगवाद के प्रवर्तक के अनुसार प्रयोगवादी कवि का मुख्य तथ्य दिये गये विकल्पों में एक से अधिक विकल्प सही है। • हिन्दी में प्रयोगवाद का प्रारम्भ सन् 1943 में अज्ञेय के संपादन में प्रकाशित ‘तारसप्तक’ से माना जाता है। इसकी भूमिका में अज्ञेय ने लिखा है कि प्रयोगवादी कवि नवीन राहों के अन्वेषी हैं। स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात अज्ञेय के सम्पादन में ‘प्रतीक’ पत्रिका का संपादन हुआ, जिसमें प्रयोगवाद का स्वरूप स्पष्ट हुआ। प्रयोगवाद की विशेषताएँ:- 1. नवीन उपमानों का प्रयोग 2. वैयक्तिकता की प्रधानता 3. प्रेम भावनाओं का खुला चित्रण 4. बुद्धिवाद की प्रधानता 5. वैचित्र्य प्रदर्शन की भावना 6. लघुमानव वाद की प्रतिष्ठा 7. मुक्त छन्दों का प्रयोग 8. रूढि़यों के प्रति विद्रोह 9. अहं की प्रधानता इत्यादि है।

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प्रयोगवाद के प्रवर्तक के अनुसार प्रयोगवादी कवि का मुख्य तथ्य दिये गये विकल्पों में एक से अधिक विकल्प सही है। • हिन्दी में प्रयोगवाद का प्रारम्भ सन् 1943 में अज्ञेय के संपादन में प्रकाशित ‘तारसप्तक’ से माना जाता है। इसकी भूमिका में अज्ञेय ने लिखा है कि प्रयोगवादी कवि नवीन राहों के अन्वेषी हैं। स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात अज्ञेय के सम्पादन में ‘प्रतीक’ पत्रिका का संपादन हुआ, जिसमें प्रयोगवाद का स्वरूप स्पष्ट हुआ। प्रयोगवाद की विशेषताएँ:- 1. नवीन उपमानों का प्रयोग 2. वैयक्तिकता की प्रधानता 3. प्रेम भावनाओं का खुला चित्रण 4. बुद्धिवाद की प्रधानता 5. वैचित्र्य प्रदर्शन की भावना 6. लघुमानव वाद की प्रतिष्ठा 7. मुक्त छन्दों का प्रयोग 8. रूढि़यों के प्रति विद्रोह 9. अहं की प्रधानता इत्यादि है।