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Q: प्रदत्तप्रश्नानां (प्रश्न संख्या(233-242) विकल्पोत्तरेषु समुचितम् उत्तरं चित्वा लिखत। अस्ति वाराणस्यां कर्पूरपटको नाम रजक:। स च एकदा अभिनववयस्कया वध्वा सह चिरं केलिं कृत्वा निर्भरमालिङ्ग्य प्रसुप्त:। तदनन्तरं तद्गृहद्रव्याणि हर्तुं चोर: प्रविष्ट:। तस्य प्राङ्गणे गर्दभो बद्धस्तिष्ठति कुक्कुरश्च उपविष्ट: अस्ति। अथ गर्दभ: श्वानमाह- सखे, भवतस्तावदयं व्यापार:। तत् किमिति। त्वम् उच्चै: शब्दं कृत्वा स्वामिनं न जागरयसि? कुक्कुरो ब्रूते-भद्र मम नियोगस्य चर्चा त्वया न कर्तव्या। त्वमेव किम् न जानासि यथा तस्य अहर्निशं गृहरक्षां करोमि। यतोऽयं चिरान्निवृत्तो ममोपयोगं न जानाति। तेनाधुनापि मम आहारदाने मन्दादर:। यतो विना विधुरदर्शनं स्वामिन उपजीविषु मन्दादरा भवन्ति। गर्दभो ब्रूते शृणु रे बर्बर। याचते कार्यकाले य: स किम् भृत्य: स किम् सुह्रत्? कुक्कुरो ब्रूते – शृणु तावत्। भृत्यान्संभाषयेद्यस्तु कार्यकाले स किम् प्रभु: यत:- आश्रितानां भृतौ स्वामिसेवायां धर्मसेवने। पुत्रस्योत्पादने चैव न सन्ति प्रतिहस्तका:।। ततो गर्दभ: सकोपमाह – अरे दुष्टमते! पापीयांस्त्वं यद्विपत्तौ स्वामिकार्योपेक्षां करोषि। भवतु तावत्। यथा स्वामी जागरिष्यति तन्मया कर्तव्यम्। यत: पृष्ठत: सेवयेदर्कम् जठरेण हुताशनम्। स्वामिनं सर्वभावेन परलोकममायया।। इत्युक्त्वा उच्चै: चीत्कारशब्दं कृतवान्। तत: रजक: तेन चीत्कारेण प्रबुद्धो निद्राभङ्गकोपात् उत्थाय गर्दभं लगुडेन ताडयामास। अतोऽहं ब्रवीमि- पराधिकारचर्चां य: कुर्यात् स्वामिहितेच्छया। स विषीदति चीत्कारात् गर्दभ: ताडितो यथा।। अस्य कथाया: नीति:
  • A. स्वामिनं न सेवयेत्
  • B. पराधिकार: चर्चां न कुर्यात्
  • C. चीत्कारं न कुर्यात्
  • D. मित्रकार्यं न कुर्यात्
Correct Answer: Option B - इस कथा से यह शिक्षा मिलती है कि दूसरे के अधिकार क्षेत्र के विषय में परस्पर वार्तालाप (चर्चा – परिचर्चा) नहीं करनी चाहिए। केवल अपने अधिकार क्षेत्र तक सीमित रहना चाहिए। अर्थात् दूसरे के कार्य में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
B. इस कथा से यह शिक्षा मिलती है कि दूसरे के अधिकार क्षेत्र के विषय में परस्पर वार्तालाप (चर्चा – परिचर्चा) नहीं करनी चाहिए। केवल अपने अधिकार क्षेत्र तक सीमित रहना चाहिए। अर्थात् दूसरे के कार्य में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

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इस कथा से यह शिक्षा मिलती है कि दूसरे के अधिकार क्षेत्र के विषय में परस्पर वार्तालाप (चर्चा – परिचर्चा) नहीं करनी चाहिए। केवल अपने अधिकार क्षेत्र तक सीमित रहना चाहिए। अर्थात् दूसरे के कार्य में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।