Correct Answer:
Option B - ‘चित्रगु:’ इति पदे बहुव्रीहि: समासोऽस्ति। चित्रगु:-चित्रा गाव: यस्य स: चित्रगु:। चित्रा: गाव: यस्य में अनेकमन्य पदार्थो से बहुव्रीहि समास हुआ। यहाँ गो शब्द के बाद जस् विभक्ति है और चित्रा में भी जस् विभक्ति है इसलिए समान विभक्ति या समानाधिकरण है। प्रातिपदिक संज्ञा, सुपोधातुप्रातिपदिकयो: से जस् का लोप करके चित्रा+गो बना। चित्रा+गो में ऊङ् प्रत्यय नहीं हुआ है तथा पूरणी अर्थ के वाचक प्रत्यय वाले शब्द और प्रियादि शब्द भी पर में नहीं है। गायों का वाचक चित्रा स्त्रीलिङ्ग है अत: स्त्रिया: पुंवद्भाषितपुंस्कादनूङ् समानाधिकरणे स्त्रियामपूरणीप्रियादिषु से गो शब्द के परे होने पर चित्रा को पुंवद्भाव होकर चित्र+गो रूप बना । गोस्त्रियों से गो के ओकार को ह्रस्व होकर चित्रगु बना। प्रातिपदिक मानकर सु विभक्ति, रुत्व विसर्ग करके चित्रगु: रूप सिद्ध हुआ।
B. ‘चित्रगु:’ इति पदे बहुव्रीहि: समासोऽस्ति। चित्रगु:-चित्रा गाव: यस्य स: चित्रगु:। चित्रा: गाव: यस्य में अनेकमन्य पदार्थो से बहुव्रीहि समास हुआ। यहाँ गो शब्द के बाद जस् विभक्ति है और चित्रा में भी जस् विभक्ति है इसलिए समान विभक्ति या समानाधिकरण है। प्रातिपदिक संज्ञा, सुपोधातुप्रातिपदिकयो: से जस् का लोप करके चित्रा+गो बना। चित्रा+गो में ऊङ् प्रत्यय नहीं हुआ है तथा पूरणी अर्थ के वाचक प्रत्यय वाले शब्द और प्रियादि शब्द भी पर में नहीं है। गायों का वाचक चित्रा स्त्रीलिङ्ग है अत: स्त्रिया: पुंवद्भाषितपुंस्कादनूङ् समानाधिकरणे स्त्रियामपूरणीप्रियादिषु से गो शब्द के परे होने पर चित्रा को पुंवद्भाव होकर चित्र+गो रूप बना । गोस्त्रियों से गो के ओकार को ह्रस्व होकर चित्रगु बना। प्रातिपदिक मानकर सु विभक्ति, रुत्व विसर्ग करके चित्रगु: रूप सिद्ध हुआ।