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Q: निम्नलिखित में से कौन-सा एक सही मिलान वाला जोड़ा है ?
  • A. मूर्त संक्रियात्मक बच्चा - संधारण एवं वर्गीकरण करने योग्य
  • B. औपचारिक संक्रियात्मक बच्चा - अनुकरण प्रारंभ, कल्पनापरक खेल
  • C. शैशवावस्था - तर्क का अनुप्रयोग और अनुमान लगाने में सक्षम
  • D. पूर्वसंक्रयात्मक बच्चा - निगमनात्मक विचार
Correct Answer: Option A - जिन पियाजे ने बालक में संज्ञानात्मक विकास को चार प्रमुख अवस्थाओं में बांटा है जो निम्न है- 1. संवेदनात्मक गामक अवस्था (शैशावस्था) (0-2 वर्ष तक) इस अवस्था में बालक वस्तु को पहचानने की कोशिश करता है तथा जैविक क्रियाओं को अपनाता है। 2. पूर्व संक्रियात्मक अवस्था (2-7 वर्ष तक) इस अवस्था में बालक क्यों ? और कैसे ? का प्रश्न करने लगता है। इसलिये पियाजे ने इस अवस्था को खोज की अवस्था कहा है। 3. मूर्त संक्रियात्मक अवस्था (7-11 वर्ष तक) इस अवस्था में बालक तार्किक चिंतन करने लगता है। बाल बौद्धिक संक्रिया (गुणा, जोड़, घटाना, भाग) के अतिरिक्त साधारण वर्गीकरण की क्रिया भी करने लगता है। 4. औपचारिक संक्रियात्मक अवस्था (11 वर्ष के बाद) इस अवस्था में बालक के चिंतन में पूर्णता आ जाती है। समस्या समाधान के बौद्धिक क्षमता का विकास हो जाता है।
A. जिन पियाजे ने बालक में संज्ञानात्मक विकास को चार प्रमुख अवस्थाओं में बांटा है जो निम्न है- 1. संवेदनात्मक गामक अवस्था (शैशावस्था) (0-2 वर्ष तक) इस अवस्था में बालक वस्तु को पहचानने की कोशिश करता है तथा जैविक क्रियाओं को अपनाता है। 2. पूर्व संक्रियात्मक अवस्था (2-7 वर्ष तक) इस अवस्था में बालक क्यों ? और कैसे ? का प्रश्न करने लगता है। इसलिये पियाजे ने इस अवस्था को खोज की अवस्था कहा है। 3. मूर्त संक्रियात्मक अवस्था (7-11 वर्ष तक) इस अवस्था में बालक तार्किक चिंतन करने लगता है। बाल बौद्धिक संक्रिया (गुणा, जोड़, घटाना, भाग) के अतिरिक्त साधारण वर्गीकरण की क्रिया भी करने लगता है। 4. औपचारिक संक्रियात्मक अवस्था (11 वर्ष के बाद) इस अवस्था में बालक के चिंतन में पूर्णता आ जाती है। समस्या समाधान के बौद्धिक क्षमता का विकास हो जाता है।

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जिन पियाजे ने बालक में संज्ञानात्मक विकास को चार प्रमुख अवस्थाओं में बांटा है जो निम्न है- 1. संवेदनात्मक गामक अवस्था (शैशावस्था) (0-2 वर्ष तक) इस अवस्था में बालक वस्तु को पहचानने की कोशिश करता है तथा जैविक क्रियाओं को अपनाता है। 2. पूर्व संक्रियात्मक अवस्था (2-7 वर्ष तक) इस अवस्था में बालक क्यों ? और कैसे ? का प्रश्न करने लगता है। इसलिये पियाजे ने इस अवस्था को खोज की अवस्था कहा है। 3. मूर्त संक्रियात्मक अवस्था (7-11 वर्ष तक) इस अवस्था में बालक तार्किक चिंतन करने लगता है। बाल बौद्धिक संक्रिया (गुणा, जोड़, घटाना, भाग) के अतिरिक्त साधारण वर्गीकरण की क्रिया भी करने लगता है। 4. औपचारिक संक्रियात्मक अवस्था (11 वर्ष के बाद) इस अवस्था में बालक के चिंतन में पूर्णता आ जाती है। समस्या समाधान के बौद्धिक क्षमता का विकास हो जाता है।