Q: निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों (प्रश्न सं. 24 से 30 तक) के सबसे उपयुक्त उत्तरवाले विकल्प चुनिए– हमारा जीवन जिन मानवीय सिद्धांतों, अनुभवों और सांस्कृतिक संस्कारों के संबल से समस्त सृष्टि के लिए महत्त्वपूर्ण बना है, परोपकार की भावना उन्हीं में एक है। मानव को दूसरे मानव के प्रति वैसा ही संवेदनात्मक उत्तरदायित्व निभाना चाहिए, जैसे वह स्वयं के प्रति निभाता है। जीवन को केवल परोपकार, पर सेवा और नि:स्वार्थ प्रेम के लिए ही वास्तविक समझना चाहिए क्योंकि नश्वर शरीर जब नष्ट हो जाएगा तो उसके बाद हमारा कुछ भी इस दुनिया के जीवों की स्मृति में नहीं रहेगा। हम जग जीवों की स्मृति में सदा-सदा के लिए तभी बने रह सकते हैं, जब हम अपने नश्वर शरीर को वैचारिक, बौद्धिक और आत्मिक चेतना से पूर्ण कर नि:स्वार्थ भाव से स्वयं को जीव सेवा में समर्पित करेंगे। हमें स्थिरता से और शांतिपूर्वक यह विचार करते रहना चाहिए कि हमारे जीवन का सर्वश्रेष्ठ उद्देश्य और एकमात्र लक्ष्य हमारे द्वारा किया जाने वाला त्याग है। त्याग योग्य व्यक्तित्व प्राप्त करने के लिए गहन तप की आवश्यकता है। त्याग का भाव किसी मनुष्य में साधारण होते हुए नहीं जन्म लेता। इसके लिए मनुष्य को जीवन-जगत और इसके जीवों के संबंध में असाधारण वैचारिक रचनात्मकता अपनाकर निरंतर योग, ध्यान, तप व साधना करनी होगी। उसे इस स्थिति से विचरते हुए विशिष्ट आध्यात्मिक अनुभवों से लैस होना होगा। आवश्यकता होने पर उसे जीवों की वास्तविक सेवा करनी होगी। जब ऐसी विशेष मानवीय परिस्थितियाँ उत्पन्न होंगी, तब ही मानव में त्याग भाव आकार ग्रहण करेगा।शरीर को ‘नश्वर’ कहा जाता है, क्योंकि वह–
A.
अल्पायु होता है।
B.
नाशवान होता है।
C.
छोटा होता है।
D.
अत्यल्प होता है।
Correct Answer:
Option B - शरीर को ‘नश्वर’ कहा जाता है क्योंकि वह नाशवान होता है।
B. शरीर को ‘नश्वर’ कहा जाता है क्योंकि वह नाशवान होता है।
Explanations:
शरीर को ‘नश्वर’ कहा जाता है क्योंकि वह नाशवान होता है।
Download Our App
Download our app to know more Lorem ipsum dolor sit amet consectetur adipisicing elit.
Excepturi, esse.
YOU ARE NOT LOGIN
Unlocking possibilities: Login required for a world of personalized
experiences.