Correct Answer:
Option A - भारवि द्वारा रचित किरातार्जुनीयम् 18 सर्गों में विभक्त है, जो महाभारत के वनपर्व से उद्धृत है। किरात के प्रथम में वनेचर द्वैतवन में राजा युधिष्ठिर से कहता है कि-
क्रियासु युक्तैर्नृप चारचक्षुषो
न वञ्चनीया: प्रभवोऽनुजीविभि:।
अतोऽर्हषि क्षन्तुमसाधु साधु वा
हितं मनोहारि च दुर्लभं वच:।।
कार्माता हि प्रकृति कृपण --------कालिदास कृत मेघदूत से अवतरित है।
अर्थो हि कन्या परकीय एव ------- कालिदास कृत अभिज्ञानशाकुन्तलम् नाटक से ली गयी है।
आपन्नर्तिप्रश्मनफला: -------कालिदास कृत मेघदूतं से ली
गयी है।
A. भारवि द्वारा रचित किरातार्जुनीयम् 18 सर्गों में विभक्त है, जो महाभारत के वनपर्व से उद्धृत है। किरात के प्रथम में वनेचर द्वैतवन में राजा युधिष्ठिर से कहता है कि-
क्रियासु युक्तैर्नृप चारचक्षुषो
न वञ्चनीया: प्रभवोऽनुजीविभि:।
अतोऽर्हषि क्षन्तुमसाधु साधु वा
हितं मनोहारि च दुर्लभं वच:।।
कार्माता हि प्रकृति कृपण --------कालिदास कृत मेघदूत से अवतरित है।
अर्थो हि कन्या परकीय एव ------- कालिदास कृत अभिज्ञानशाकुन्तलम् नाटक से ली गयी है।
आपन्नर्तिप्रश्मनफला: -------कालिदास कृत मेघदूतं से ली
गयी है।