Correct Answer:
Option B - द्रव की खुली सतह से प्रत्येक ताप पर धीरे-धीरे द्रव का वाष्प में बदलना वाष्पीकरण कहलाता है। वाष्पीकरण के लिए द्रव को ऊष्मा की आवश्यकता होती है, यह ऊष्मा द्रव अपने अंदर से ही प्राप्त करता है, अत: द्रव ठण्डा हो जाता है। आम जीवन में इसके कई उदाहरण देखने को मिलते हैं, जैसे – हमारे शरीर में पसीना जब सूखता है, तो हमें ठण्डक महसूस होती है, क्योंकि पसीना सूखने यानी वाष्पीकरण के लिए ऊष्मा शरीर से ग्रहण होती है अत: शरीर ठण्डा हो जाता है। वाष्पीकरण के कारण ही कूलर ठण्ड उत्पन्न करता है एवं सुराही अथवा मिट्टी के घड़े का पानी ठण्डा हो जाता है।
B. द्रव की खुली सतह से प्रत्येक ताप पर धीरे-धीरे द्रव का वाष्प में बदलना वाष्पीकरण कहलाता है। वाष्पीकरण के लिए द्रव को ऊष्मा की आवश्यकता होती है, यह ऊष्मा द्रव अपने अंदर से ही प्राप्त करता है, अत: द्रव ठण्डा हो जाता है। आम जीवन में इसके कई उदाहरण देखने को मिलते हैं, जैसे – हमारे शरीर में पसीना जब सूखता है, तो हमें ठण्डक महसूस होती है, क्योंकि पसीना सूखने यानी वाष्पीकरण के लिए ऊष्मा शरीर से ग्रहण होती है अत: शरीर ठण्डा हो जाता है। वाष्पीकरण के कारण ही कूलर ठण्ड उत्पन्न करता है एवं सुराही अथवा मिट्टी के घड़े का पानी ठण्डा हो जाता है।