Explanations:
संथारा या अन्वर्थकी या निष्प्रतिकारमरण्वैकुण्ठ सल्लेखना, जैन समुदाय का एक धार्मिक संस्कार है। जैन धर्म में इसका अर्थ उपवास द्वारा प्राण त्याग करना है। संथारा श्वेताम्बरों में प्रचलित है जबकि दिगम्बर इस परम्परा को सल्लेखना कहते है। चन्द्रगुप्त मौर्य, राष्ट्रकूट नरेश इन्द्र चतुर्थ तथा विद्वान हेमचन्द्र ने अपने जीवन के अन्तिम समय में इसी पद्वति के द्वारा मृत्यु का वरण किया था।