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Q: मम्मटानुसारेण काव्यलक्षणमस्ति
  • A. शब्दार्थौ सहितौ काव्यम्
  • B. वाक्यं रसात्मकं काव्यम्
  • C. तददोषौ शब्दार्थौ सगुणावनलङ्कृती पुन: क्वापि
  • D. रमणीयार्थप्रतिपादक: शब्द: काव्यम्
Correct Answer: Option C - मम्मटानुसारेण काव्य लक्षणमस्ति- तददोषौ शब्दार्थौ सगुणावनलङ्कृती पुन: क्वापि। अर्थात् दोषों से रहित, गुण-युक्त और (साधरणत: अलङ्कार सहित परन्तु) कहीं-कहीं अलङ्कार-रहित ( स्फुट अलङ्कार न होने पर) शब्द और अर्थ (दोनों की समष्टि) काव्य कहलाती है। तत् काव्य का बोधक है और इस शब्दार्थौ के तीन लक्षण अदोषौ, सगुणौ तथा अनलङ्कृती पुन: क्वापि हैं। पुन: क्वापि का तात्पर्य है ईषत् (अस्फुट) अर्थात् कहीं-कहीं पर अलङ्कार के स्फुट न होने पर काव्यत्व हानि नहीं होती है। जैसे- य: कौमारहर: स एव हि वरस्ता एव चैत्रक्षपा ..........।। इसमें शृङ्गार रस की प्रधानता से कोई स्फुट अलङ्कार नहीं है। इसी प्रकार- ‘शब्दार्थौ सहितौ काव्यम्-भामह’ का, ‘वाक्यं रसात्मकं ‘काव्यम्-विश्वनाथ’ का तथा ‘रमणीयार्थप्रतिपादक: शब्द: काव्यम्- पण्डितराज जगन्नाथ का काव्य लक्षण है।
C. मम्मटानुसारेण काव्य लक्षणमस्ति- तददोषौ शब्दार्थौ सगुणावनलङ्कृती पुन: क्वापि। अर्थात् दोषों से रहित, गुण-युक्त और (साधरणत: अलङ्कार सहित परन्तु) कहीं-कहीं अलङ्कार-रहित ( स्फुट अलङ्कार न होने पर) शब्द और अर्थ (दोनों की समष्टि) काव्य कहलाती है। तत् काव्य का बोधक है और इस शब्दार्थौ के तीन लक्षण अदोषौ, सगुणौ तथा अनलङ्कृती पुन: क्वापि हैं। पुन: क्वापि का तात्पर्य है ईषत् (अस्फुट) अर्थात् कहीं-कहीं पर अलङ्कार के स्फुट न होने पर काव्यत्व हानि नहीं होती है। जैसे- य: कौमारहर: स एव हि वरस्ता एव चैत्रक्षपा ..........।। इसमें शृङ्गार रस की प्रधानता से कोई स्फुट अलङ्कार नहीं है। इसी प्रकार- ‘शब्दार्थौ सहितौ काव्यम्-भामह’ का, ‘वाक्यं रसात्मकं ‘काव्यम्-विश्वनाथ’ का तथा ‘रमणीयार्थप्रतिपादक: शब्द: काव्यम्- पण्डितराज जगन्नाथ का काव्य लक्षण है।

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मम्मटानुसारेण काव्य लक्षणमस्ति- तददोषौ शब्दार्थौ सगुणावनलङ्कृती पुन: क्वापि। अर्थात् दोषों से रहित, गुण-युक्त और (साधरणत: अलङ्कार सहित परन्तु) कहीं-कहीं अलङ्कार-रहित ( स्फुट अलङ्कार न होने पर) शब्द और अर्थ (दोनों की समष्टि) काव्य कहलाती है। तत् काव्य का बोधक है और इस शब्दार्थौ के तीन लक्षण अदोषौ, सगुणौ तथा अनलङ्कृती पुन: क्वापि हैं। पुन: क्वापि का तात्पर्य है ईषत् (अस्फुट) अर्थात् कहीं-कहीं पर अलङ्कार के स्फुट न होने पर काव्यत्व हानि नहीं होती है। जैसे- य: कौमारहर: स एव हि वरस्ता एव चैत्रक्षपा ..........।। इसमें शृङ्गार रस की प्रधानता से कोई स्फुट अलङ्कार नहीं है। इसी प्रकार- ‘शब्दार्थौ सहितौ काव्यम्-भामह’ का, ‘वाक्यं रसात्मकं ‘काव्यम्-विश्वनाथ’ का तथा ‘रमणीयार्थप्रतिपादक: शब्द: काव्यम्- पण्डितराज जगन्नाथ का काव्य लक्षण है।