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Q: ‘मूलन ही की जहाँ अधोगति केशव गाइय। होम हुतासन धूम नगर एकै मलिनाइय।।’ –इन काव्य–पंक्तियों में अलंकार है–
  • A. परिसंख्य
  • B. असंगति
  • C. प्रतीप
  • D. विभावना
Correct Answer: Option A - ‘मूलन ही की जहाँ अधोगति केशव गाइय। होम हुतासन धूम नगर एकै मलिनाइय।।’ इन काव्य पंक्तियों में परिसंख्य अलंकार है। परिसंख्य अलंकार– अन्यत्र सम्भव वस्तु को निषेध करके एक स्थान विशेष पर उसके नियमन को परिसंख्य अलंकार कहा जाता है। अथवा किसी वस्तु के गुणादि को उस वस्तु के अन्य स्थानों से हटाकर एक ही स्थान पर प्रतिस्थापित कर देना परिसंख्य अलंकार है। जयदेव कहते हैं– ‘परिसंख्या निषिध्यैकमन्यस्मिन् वस्तुयंत्रणम् । –(चन्द्रालोक) से। अर्थात् एक पदार्थ का एक स्थान से अन्य स्थान पर उसे स्थित दिखलाने में परिसंख्य है। असंगति अलंकार– इसमें कारण का होना कहीं और कार्य का होना कहीं वर्णित होता है। उदाहरण– पलनि पीक अंजन अधर, धरे महावर भाल। आज मिले सु भली करी, भले बने ही लाल। विभावना अलंकार– कारण और कार्य के सम्बन्ध में चमत्कारपूर्ण कल्पना अर्थात् कारण के अभाव में कार्य की उत्पत्ति का वर्णन, विभावना अलंकार है। जैसे- ‘‘बिनु पद चलै सुनै बिनु काना।’ यहाँ कारण (पैर और काना) के अभाव में चलना और सुनना कहा गया है। अत: विभावना अलंकार है। प्रतीप अलंकार–प्रतीप का अर्थ है–‘‘उल्टा/विपरीत। इस प्रकार जहाँ बड़े/उच्च को छोटा और छोटे/नीच को बड़ा बताया जाता है, अर्थात् जब उपमेय को उपमान और उपमान को उपमेय बना दिया जाता है, तब वहाँ प्रतीप अलंकार होता है। यह ‘उपमा अलंकार’ का उल्टा होता है क्योंकि इस अलंकार में उपमान को लज्जित, पराजित या नीचा दिखाया जाता है और उपमेय को श्रेष्ठ बताया जाता है। उदाहरण : ‘‘सिय मुख समता किमि करै चंद वापुरो रंक।’’
A. ‘मूलन ही की जहाँ अधोगति केशव गाइय। होम हुतासन धूम नगर एकै मलिनाइय।।’ इन काव्य पंक्तियों में परिसंख्य अलंकार है। परिसंख्य अलंकार– अन्यत्र सम्भव वस्तु को निषेध करके एक स्थान विशेष पर उसके नियमन को परिसंख्य अलंकार कहा जाता है। अथवा किसी वस्तु के गुणादि को उस वस्तु के अन्य स्थानों से हटाकर एक ही स्थान पर प्रतिस्थापित कर देना परिसंख्य अलंकार है। जयदेव कहते हैं– ‘परिसंख्या निषिध्यैकमन्यस्मिन् वस्तुयंत्रणम् । –(चन्द्रालोक) से। अर्थात् एक पदार्थ का एक स्थान से अन्य स्थान पर उसे स्थित दिखलाने में परिसंख्य है। असंगति अलंकार– इसमें कारण का होना कहीं और कार्य का होना कहीं वर्णित होता है। उदाहरण– पलनि पीक अंजन अधर, धरे महावर भाल। आज मिले सु भली करी, भले बने ही लाल। विभावना अलंकार– कारण और कार्य के सम्बन्ध में चमत्कारपूर्ण कल्पना अर्थात् कारण के अभाव में कार्य की उत्पत्ति का वर्णन, विभावना अलंकार है। जैसे- ‘‘बिनु पद चलै सुनै बिनु काना।’ यहाँ कारण (पैर और काना) के अभाव में चलना और सुनना कहा गया है। अत: विभावना अलंकार है। प्रतीप अलंकार–प्रतीप का अर्थ है–‘‘उल्टा/विपरीत। इस प्रकार जहाँ बड़े/उच्च को छोटा और छोटे/नीच को बड़ा बताया जाता है, अर्थात् जब उपमेय को उपमान और उपमान को उपमेय बना दिया जाता है, तब वहाँ प्रतीप अलंकार होता है। यह ‘उपमा अलंकार’ का उल्टा होता है क्योंकि इस अलंकार में उपमान को लज्जित, पराजित या नीचा दिखाया जाता है और उपमेय को श्रेष्ठ बताया जाता है। उदाहरण : ‘‘सिय मुख समता किमि करै चंद वापुरो रंक।’’

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‘मूलन ही की जहाँ अधोगति केशव गाइय। होम हुतासन धूम नगर एकै मलिनाइय।।’ इन काव्य पंक्तियों में परिसंख्य अलंकार है। परिसंख्य अलंकार– अन्यत्र सम्भव वस्तु को निषेध करके एक स्थान विशेष पर उसके नियमन को परिसंख्य अलंकार कहा जाता है। अथवा किसी वस्तु के गुणादि को उस वस्तु के अन्य स्थानों से हटाकर एक ही स्थान पर प्रतिस्थापित कर देना परिसंख्य अलंकार है। जयदेव कहते हैं– ‘परिसंख्या निषिध्यैकमन्यस्मिन् वस्तुयंत्रणम् । –(चन्द्रालोक) से। अर्थात् एक पदार्थ का एक स्थान से अन्य स्थान पर उसे स्थित दिखलाने में परिसंख्य है। असंगति अलंकार– इसमें कारण का होना कहीं और कार्य का होना कहीं वर्णित होता है। उदाहरण– पलनि पीक अंजन अधर, धरे महावर भाल। आज मिले सु भली करी, भले बने ही लाल। विभावना अलंकार– कारण और कार्य के सम्बन्ध में चमत्कारपूर्ण कल्पना अर्थात् कारण के अभाव में कार्य की उत्पत्ति का वर्णन, विभावना अलंकार है। जैसे- ‘‘बिनु पद चलै सुनै बिनु काना।’ यहाँ कारण (पैर और काना) के अभाव में चलना और सुनना कहा गया है। अत: विभावना अलंकार है। प्रतीप अलंकार–प्रतीप का अर्थ है–‘‘उल्टा/विपरीत। इस प्रकार जहाँ बड़े/उच्च को छोटा और छोटे/नीच को बड़ा बताया जाता है, अर्थात् जब उपमेय को उपमान और उपमान को उपमेय बना दिया जाता है, तब वहाँ प्रतीप अलंकार होता है। यह ‘उपमा अलंकार’ का उल्टा होता है क्योंकि इस अलंकार में उपमान को लज्जित, पराजित या नीचा दिखाया जाता है और उपमेय को श्रेष्ठ बताया जाता है। उदाहरण : ‘‘सिय मुख समता किमि करै चंद वापुरो रंक।’’