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Q: लक्ष्मीं प्रति किमकथयत् ?
  • A. सरस्वतीपरिगृहीतमीष्र्ययेव नालिङ्गति
  • B. वरं पर्वतदुर्गेषु भ्रान्तं वनचरै: सह
  • C. संतप्तानां त्वमसि शरणम्
  • D. जातं वंशे भुवनविदिते
Correct Answer: Option A - लक्ष्मीं प्रति अकथयत्- सरस्वतीपरिगृहीतमीष्र्ययेव नालिङ्गति। अर्थात् सरस्वती द्वारा स्वीकृत व्यक्ति को लक्ष्मी ईष्र्या के कारण आलिङ्गन नहीं करती। यह सूक्ति शुकनासोपदेश से है। ‘वरं पर्वतदुर्गेषु भ्रान्तं वनेचरै: सह (नीतिशतक)’- वनेचरों के साथ पर्वतों पर तथा दुर्गम स्थानों में विचरण करना अच्छा है। ‘सन्तप्तानां त्वमसि शरणम्’ (मेघदूतम्)- हे मेघ! तुम पीडि़तों के रक्षक हो। ‘जातं वंशे भुवनविदिते’ (मेघदूतम्)-
A. लक्ष्मीं प्रति अकथयत्- सरस्वतीपरिगृहीतमीष्र्ययेव नालिङ्गति। अर्थात् सरस्वती द्वारा स्वीकृत व्यक्ति को लक्ष्मी ईष्र्या के कारण आलिङ्गन नहीं करती। यह सूक्ति शुकनासोपदेश से है। ‘वरं पर्वतदुर्गेषु भ्रान्तं वनेचरै: सह (नीतिशतक)’- वनेचरों के साथ पर्वतों पर तथा दुर्गम स्थानों में विचरण करना अच्छा है। ‘सन्तप्तानां त्वमसि शरणम्’ (मेघदूतम्)- हे मेघ! तुम पीडि़तों के रक्षक हो। ‘जातं वंशे भुवनविदिते’ (मेघदूतम्)-

Explanations:

लक्ष्मीं प्रति अकथयत्- सरस्वतीपरिगृहीतमीष्र्ययेव नालिङ्गति। अर्थात् सरस्वती द्वारा स्वीकृत व्यक्ति को लक्ष्मी ईष्र्या के कारण आलिङ्गन नहीं करती। यह सूक्ति शुकनासोपदेश से है। ‘वरं पर्वतदुर्गेषु भ्रान्तं वनेचरै: सह (नीतिशतक)’- वनेचरों के साथ पर्वतों पर तथा दुर्गम स्थानों में विचरण करना अच्छा है। ‘सन्तप्तानां त्वमसि शरणम्’ (मेघदूतम्)- हे मेघ! तुम पीडि़तों के रक्षक हो। ‘जातं वंशे भुवनविदिते’ (मेघदूतम्)-