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Q: ‘कुशल:’ इति उदाहरणमस्ति
  • A. अर्थविस्तारस्य
  • B. अर्थसंकोचस्य
  • C. अर्थापकर्षस्य
  • D. एतेषां कस्यापि न
Correct Answer: Option A - ‘कुशल:’ इति उदाहरणमस्ति ‘अर्थविस्तारस्य’। अर्थात् ‘कुशल’ यह अर्थ विस्तार का उदाहरण है। यह अर्थ परिवर्तन परिवर्तनशील संसार में भाषा के प्रत्येक पहलुओ (ध्वनि, शब्द, अर्थ) में होने से हुआ है, इस कुशल शब्द का अर्थ था- कुशान् लाति (कुशो को लाना या लेना) कुश का अग्र भाग तीक्ष्ण होने से चतुरता का सूचक था। यह शब्द धीरे-धीरे ‘कुश लाना’ अर्थ को छोड़कर निपुणता का अर्थ देने लगा। अत: अर्थ-विस्तार होने से ‘वह संगीत में कुशल है, ‘शास्त्रों में कुशल है’, खेलने में कुशल है आदि अर्थ होने लगा। अर्थ परिवर्तन (अर्थ विकास) की तीन दिशाएँ हैं- (1) अर्थविस्तार- प्रवीण, तैल, गोशाला, गोष्ठ, महाराज आदि। (2) अर्थसंकोच - इसमें विस्तृत अर्थ संकुचित रूप लेता है- गो, अश्व, पृथ्वी आदि। (3) अर्थादेश- दूसरा-अर्थ आदेश होना। इसके दो भेद हैं- अर्थोत्कर्ष - मुग्ध- मूर्ख से मोहित अर्थ होना। साहस-साहसी, कर्पट आदि। (4) अर्थोपकर्ष - असुर देववाचक से असुर हो गया। देवानामप्रिय आदि। प्रश्नानुसार विकल्प (a) सही है।
A. ‘कुशल:’ इति उदाहरणमस्ति ‘अर्थविस्तारस्य’। अर्थात् ‘कुशल’ यह अर्थ विस्तार का उदाहरण है। यह अर्थ परिवर्तन परिवर्तनशील संसार में भाषा के प्रत्येक पहलुओ (ध्वनि, शब्द, अर्थ) में होने से हुआ है, इस कुशल शब्द का अर्थ था- कुशान् लाति (कुशो को लाना या लेना) कुश का अग्र भाग तीक्ष्ण होने से चतुरता का सूचक था। यह शब्द धीरे-धीरे ‘कुश लाना’ अर्थ को छोड़कर निपुणता का अर्थ देने लगा। अत: अर्थ-विस्तार होने से ‘वह संगीत में कुशल है, ‘शास्त्रों में कुशल है’, खेलने में कुशल है आदि अर्थ होने लगा। अर्थ परिवर्तन (अर्थ विकास) की तीन दिशाएँ हैं- (1) अर्थविस्तार- प्रवीण, तैल, गोशाला, गोष्ठ, महाराज आदि। (2) अर्थसंकोच - इसमें विस्तृत अर्थ संकुचित रूप लेता है- गो, अश्व, पृथ्वी आदि। (3) अर्थादेश- दूसरा-अर्थ आदेश होना। इसके दो भेद हैं- अर्थोत्कर्ष - मुग्ध- मूर्ख से मोहित अर्थ होना। साहस-साहसी, कर्पट आदि। (4) अर्थोपकर्ष - असुर देववाचक से असुर हो गया। देवानामप्रिय आदि। प्रश्नानुसार विकल्प (a) सही है।

Explanations:

‘कुशल:’ इति उदाहरणमस्ति ‘अर्थविस्तारस्य’। अर्थात् ‘कुशल’ यह अर्थ विस्तार का उदाहरण है। यह अर्थ परिवर्तन परिवर्तनशील संसार में भाषा के प्रत्येक पहलुओ (ध्वनि, शब्द, अर्थ) में होने से हुआ है, इस कुशल शब्द का अर्थ था- कुशान् लाति (कुशो को लाना या लेना) कुश का अग्र भाग तीक्ष्ण होने से चतुरता का सूचक था। यह शब्द धीरे-धीरे ‘कुश लाना’ अर्थ को छोड़कर निपुणता का अर्थ देने लगा। अत: अर्थ-विस्तार होने से ‘वह संगीत में कुशल है, ‘शास्त्रों में कुशल है’, खेलने में कुशल है आदि अर्थ होने लगा। अर्थ परिवर्तन (अर्थ विकास) की तीन दिशाएँ हैं- (1) अर्थविस्तार- प्रवीण, तैल, गोशाला, गोष्ठ, महाराज आदि। (2) अर्थसंकोच - इसमें विस्तृत अर्थ संकुचित रूप लेता है- गो, अश्व, पृथ्वी आदि। (3) अर्थादेश- दूसरा-अर्थ आदेश होना। इसके दो भेद हैं- अर्थोत्कर्ष - मुग्ध- मूर्ख से मोहित अर्थ होना। साहस-साहसी, कर्पट आदि। (4) अर्थोपकर्ष - असुर देववाचक से असुर हो गया। देवानामप्रिय आदि। प्रश्नानुसार विकल्प (a) सही है।